राही मासूम रजा और आधा गाँव
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 7:24 PM | 0 comments
पुस्तक उपलब्ध
मूल्य 200 (25प्रतिशत छूट के साथ)
भूमिका
डॉ० मेराज अहमद:सम्पूर्ण समाज की अभिव्यक्ति मुस्लिम कथाकार और उनकी हिन्दी कहानियाँ कहानियाँ
हसन जमाल : चलते हैं तो कोर्ट चलिए
मुशर्रफ आलम जौक़ी : सब साजिन्दे
एखलाक अहमद जई : इब्लीस की प्रार्थना सभा
हबीब कैफी : खाये-पीये लोग
तारिक असलम तस्नीम : बूढ़ा बरगद
अब्दुल बिस्मिल्लाह : जीना तो पड़ेगा
असगर वजाहत : सारी तालीमात
मेहरून्निसा परवेज : पासंग
नासिरा शर्मा : कुंइयांजान
मेराज अहमद : वाजिद साँई
अनवर सुहैल : दहशतगर्द
आशिक बालौत : मौत-दर-मौत
शकील : सुकून
मौ० आरिफ : एक दोयम दर्जे का पत्र
एम.हनीफ मदार : बंद कमरे की रोशनी
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 3:28 PM | 0 comments
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 3:57 AM | 0 comments
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 3:54 AM | 0 comments
- राही मासूम रजा
जैनब की आँखों में रास्ते की धूल थी, उसने अंगुलियों से आँखें मलीं ... हां, सामने मदीना ही था। नाना मुहम्मद का मदीना। जैनब की आँखें भर आयीं, लेकिन रोना किसलिए ?
बग़ल वाले महमिल का पर्दा उठाये कुलसूम का मर्सिया झांक रहा था :
ऐ नाना के मदीने,
हमें स्वीकार न कर
हमें स्वीकार न कर क्योंकि हम गये थे तो गोदें भरी थीं
और लौटे हैं तो गोदें वीरान हैं ......
एक तरफ़ से मदीना आ रहा था। दूसरी तरफ़ से जैनब का कारवां बढ़ रहा था ... और यादों का दर्द बढ़ता जा रहा था। वह कुछ कैसे बता पायेगी ? उसकी आँखों में आँसुओं की न जाने कितनी नदियां सूख चुकी थीं, उसे ऐसा लगा, जैसे सामने मदीना नहीं है, बल्कि माँ खड़ी है - बाहें, फैलाये। आँसू जैनब के गले में उतर आये- माँ, हम हुसैन को खो आये!
हुसैन। इस नाम में न जाने क्या था कि ज+बान पर आते ही घुल गया और अमृत बन कर रंगों में दौड़ने लगा और बाहों पर पड़े रस्सियों के निशान मिट गये और जैनब को ऐसा लगा, जैसे सब साथ है जैसे अब्बास और अली अकबर अब सवारियों के उतारने का बंदोबस्त करने आने ही वाले हैं। जैसे वह हुसैन की आवाज सुनने ही वाली है-बहन, उतरो, मदीना आ गया।
जैनब को वह रात अच्छी तरह याद थी जब मदीना के गवर्नर वलीद इब्ने-अकबा ने हुसैन को अपने घर बुलाया था, हुसैन तैयार हुए तो फातमी जवान भी तलवारें ले कर उठ खड़े हुए क्योंकि सब जानते थे कि वलीद ने हुसैन को क्यों बुलवाया है। वलीद के पास दमिश्क से यह फरमान आया हुआ था कि हुसैन से कहो कि सिर छुका दें और अगर वह सिर न झुकायें तो सिर काट लिया जाये। वलीद को मालूम था कि जिसे फ़ातिमा ने चक्की पीस-पीस कर पाला है और यहूदियों के बाग़ में पानी चलाकर जिसे अली ने सिर बुलंद करने का सबक़ दिया है, वह सिर नहीं झुकायेगा। यही हुआ। हुसैन उससे यह कह कर चले आये कि हुसैन कोई काम रात के अंधेरे में चुपचाप नहीं करता। सुबह को जवाब दिया जायेगा। परन्तु सुबह होने से पहले हुसैन ने मदीना छोड़ दिया।
जैनब अपने दो बेटों को लेकर भाई के साथ चली, बड़ा बेटा औन ११ साल का था और छोटा बेटा मुहम्मद १० साल का। अब्दुल्ला ने दोनों बेटों को जैनब के हवाले करके कहा था- जैनब, मैं बीमार न होता तो खुद चलता। कोई बुरा समय आ जाये तो मेरी ओर से इन लड़कों को हुसैन पर न्यौछावर कर देना।
यात्रा शुरू हुई। नीचे रेत थी, ऊपर आसमान और वहीं चमचमाता हुआ सूरज बच्चे पानी मांग रहे थे। हुसैन का घोड़ा पानी माँग रहा था और अरब के मशहूर सूरमा हुर की सेना कूफे के गवर्नर इब्ने ज्याद के हुक्म से हुसैन को घेरने के लिए आ पहुंची थी वह सेना परछाई की तरह कर्बला तक हुसैन के साथ आयी।
फुरात का पानी देख कर हुसैन ने घोड़े की लगाम खींच ली, जवानों ने अंगों के बाँध खोल दिये, बच्चे किलकारियां भर कर उछल पडे.... नहर चल रही थी। कारवां रुक गया था।
फिर ताबड़तोड़ फ़ौजें आने लगीं : सेनाध्यक्ष अमर इब्ने साद ने हुक्म दिया कि नहर के किनारे शाही सेना का पड़ाव पड़ेगा। हुसैन ने सौतेले भाई अब्बास से कहा- मैं चाहता हूं कि शाही इतिहासकार को हमारी मौत से जोड़ने के लिए कोई बात न मिले। मैं यह चाहता हूं कि वह केवल यह लिख पाये कि शाही फ़ौजों ने मुहम्मद की औलाद को क़त्ल कर दिया। अब्बास चुप हो गया। ख़ेमें उखाड़े गये और उन्हें ठंडे पानी से बहुत दूर दहकती हुई रेत में गाड़ दिया गया। हुसैन ने यही कहा था- मैं पानी के लिए लड़ना नहीं चाहता। मैंने सर झुकाने से इनकार किया। सिर न झुकाना मनुष्य का अधिकार है। मैं केवल इस अधिकार के लिए लड़ना चाहता हूँ।
हर तरफ एक ही आवाज थी- पानी! पानी! और हुसैन के कंधे जिम्मेदारी के बोझ से दुखने लगे थे।
रात को फैसला कर लिया गया कि सुबह ही लड़ाई होगी।
सबेरा हुआ। जैनब ने औन और मुहम्मद की कमर से तलवारें बांध दीं और कहा-मामू के साथ सुबह की नमाज पढ़ो। हुसैन ने नमाज पढ़वायी।
सामने यजीद की सेना थी। पीछे खेमों में औरतें और बच्चे थे। डेढ़ सौ सिपाही दस हजार सिपाहियों के सामने सीना ताने खड़े थे। डेढ़ सौ सिपाहियों में सबसे छोटा सिपाही १० वर्ष का मुहम्मद था और सबसे बड़ा अड़सठ वर्ष का हुसैन।
यकायक शाही फ़ौज में एक शोर हुआ। जैनब जो द्वार पर खड़ी भाई की तरफ़ देख रही थी, चौंक उठी सामने से चार सवार चले आ रहे थे। जैनब ने हुर को पहचान लिया।
और फिर जो कुछ हुआ उसे जैनब भूल जाना चाहती थी। उसने औन और मुहम्मद को घायल हो कर गिरते देखा, उसने अली अकबर को बरछी खाते देखा। उसने अब्बास की बांहे कटते देखीं। उसने १० वर्ष के क़ासिम की लाश को घोड़ों के सुमों में आते देखा। उसने देखा कि हबीब अपनी भवों को ऊपर उठाकर रूमाल से बांध रहे हैं। उसने मुस्लिम इब्ने औसजा को तीरों से छलनी होते देखा। उसने आसमान की तरफ देखा। आसमान में सूरज अकेला था और कर्बला में हुसैन।
हुसैन कभी दिखायी देते, कभी डूब जाते। जैनब चाहती थी कि सब कुछ अपनी आँखों से देखें। सामने एक टीला था। वह टीले पर जा चढ़ी ... तीसरे पहर की नमाज का समय आ गया था, हुसैन घोड़े से उतर पड़े। जैनब ने उनका सिर सिजदे में झुकते देखा। फिर भीड़ इतनी बढ़ गयी कि टीला नीचा हो गया। जैनब कुछ न देख सकी और फिर भीड़ में एक नेजा उठा। उस पर हुसैन का सिर ... कितना ऊंचा!
... कुलसूम अपना मरसिया गुनगुना रही थी :
- नाना के मदीने
- हमे स्वीकार न कर ....
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 3:52 AM | 0 comments
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 4:03 PM | 0 comments
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 3:48 PM | 0 comments
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 6:38 PM | 0 comments
क्रांति कथा
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
कान खोलकर सुना कथा है क्रांति के पहले सावन की
सबने चलाया, धीरे-धीरे फौज पे अपना जादू
आजादी की नई कली चटकी तो फैली खुशबू
हिन्दी फौज में नफरत की एक आँधी आई हरसू (चारों ओर)
जिसको पानी समझ रहे थे वह तो निकला बालू
बाँध लो सबने एक कमल से डोरी अपने जीवन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
उत्तर भारत में पूरब से पश्छिम तक तय्यारी
डग,डग,डग,डग बजी डुगडुगी क्या कहता है मदारी
नट आए तो कूद-फाँद में इनकी मारामारी
कठपुतली का नाच देखने आयेंगे नरनारी
कठपुतली के नाच की गत पर क्रान्ति की गरम हवा सनकी
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
छावनी में पटना की आते थे अक्सर एक मुल्ला
उजली दाढ़ी, उजला कुरता और उजला पाएजामा
मुद्दत तक गोरे नहीं समझे क्या मक़सद था उनका
रखके किताबों में लाए थे शहर से वह संदेसा
आजादी के दीवाने को फिक्र नहीं थी तन मन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
एक दिन चुपके से मुख्बिर (गुप्तचर) ने उनकी खबर पहुँचाई
अंग्रेजी शैतानों की यह सुनते ही बन आई
मुल्ला जी बेचारे ने तब शायद फांसी पाई
गोरे तो समझे थे मुल्ला जी को सिर्फ एक राई
लेकिन कोह हिमाला निकली ऊँचाई उस गर्दन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
पटना के सब मुल्ला यूं तो कहने को थे वहाबी
लेकिन सर से पांवों तलक थे सारे मुल्ला हिन्दी
उन सबने जब चार तरफ यह घोर निराशा देखी
तब कुरान के जुजदानों (बस्ता) में एक कटार-सी चमकी
उन सबने तब पाल बनाई पैगम्बर के दामन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
मुल्ला काम में अपने मगन थे, पंडित अपनी धुन में
धीरे-धीरे आजादी का रस आया जामून में
तलवारों की धारें-सी चमकीं एक-एक नाखून में
रुत बदली तो ऐसी बदली जेठ लगा फागुन में
तपते जेठ ने बात सुनाई आकर भीगे सावन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
पटना के बाज+ार पे हैं तारीख की अब भी निगाहें
दिल्ली के दरबार की जानिब (दिल्ली दरबार की ओर से) से वाटें तनख्वाहों
दिल्ली की जानिब फैली थीं दानापुर की बांहें
चाँदी की झाड़ से झाड़ें आजादी की राहें देश की
दुश्मन नहीं बनी थी तब तक गाँठ महाजन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
मोतीधर ने गद्दारी की और अंग्रेज ने जाना
ऐसे गद्दारों का भैया कहो कहां हैं ठिकाना
देश बेचकर पाया होगा चन्द टकों का बयाना
गद्दारी करने से तो अच्छा ही था मर जाना
मर जाता तो धूल दवा बन जाती उसके दामन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सत्तावन की
देश के दुश्मन के मुख्बिर पर इस धरती की लानत
अपने देश की नर्म हवा पानी मिट्टी को लानत
इस मिट्टी से बनने वाले नर-नारी की लानत
लानत उस पर भाई-बहन की लानत रक्षाबन्धन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
दो गद्दार जमादारों के साथ चले कुछ फौजी
बोध गया की राह में इक इक्के की पायल खनकी
इक्कावान ने उनके पास पहुँचकर रोकी घोड़ी
इक्का पर दो मियाँ जी बैठे रक्खी थी इक थैली
इन फौजों गद्दारों ने कुछ हँू हाँ की कुछ कदगन (अस्वीकृति) की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सत्तावन की
इक्का वालों में से इक ने उनको दिया रुपैया
और कहा यह इनसे दिल्ली से आयेगा पहिया
उन दोनों का हश्र हुआ क्या यह न किसी ने जाना
उसके बाद न फिर उन दोनों को दुनिया ने देखा
जाने कब तक राह तका की राह उन्हें मतवालन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
पटना के अत्राफ (पटना की दिशा में) में फैला छुट पुट यों जो उजाला
दिल ही दिल में घबराया तब अंग्रेजों का अंधेरा
अंग्रेजों ने सर जोड़े और जोड़ के सर यह सोचा
जासूसों को चार तरफ जल्दी जल्दी दौड़ाया
यह है धरती राम की लेकिन कौन कमी है रावन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
जासूसों के गोल चले ले लेकर उजले दामन
राम की चीख सुनी तो फौरन धोखा खा गये लछमन
दिल के द्वार से निकली बाहर-सीता देखकर बाह्मन
आजादी की सीता को झटपट हर ले गया रावन
राम की हालत क्या कहिए क्या कहिए हालत लछमन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
जासूसों ने ढूंढा और इक दस्तावेज निकाली
जिसके हर हर लफ्ज से छलकी खून की गहरी लाली
खून की सुर्खी देख के काँपी रात भयानक काली
आजादी को सींच रहे थे अपने खून से माली
वह कागज था एक कहानी कितने दिलों के धड़कन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
वह कागज जन्नार (माला) की दोड़ी और तस्बीह (माला) का दाना
हिन्दू मुस्लिम ऐके का था एक अमिट अफसाना
एक सतर काबा थी उसकी एक सतर बुतखाना
दो सतरों के बीच में था आजादी का पैमाना
एक जुबाँ है हिन्दू मुस्लिम दोनों दिलों की धड़कन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
यह सब देख के अंग्रेजों के पाँव की धरती सरकी
सोन किनारे ऐसे ही में झूमके आई दोरी (यह मेला अब भी लगता है)
मेंढे गायें बरघों की जोड़ी (बैलों की जोड़ी) और घोड़ा हाथी
बच्चे कच्चे बूढ़े वाले मर्द के साथ लुगाई (पति-पत्नी)
धूम धड़क्का भीड़ भड़क्का गीत पे ढोलक भी ठनकी
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
इस मजमें में एक तरफ से ख्वाजा हसन भी आये
अपने खेमे में बैठे चारों पर्दे सरकाये
रात गये तक लोग आते थे अपने पैर दबाये
आजादी के दीवानों ने अपने पैर जमाये
ऐ दोरी! क्या याद नहीं आती अब तुझको उस सन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुना सत्तावन की
भारत वाले देख रहे थे महायुद्ध के सपने
जो नहीं समझे वह भी समझे जो समझे वह समझे
ऐसी हवा थी युद्ध का खेल ही खेल रहे थे बच्चे
उन्तीस मार्च को बैरकपूर में लड़ गये मंगल पांडे
अब तक याद है फाँसी के फन्दे में ऐंठन गर्दन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 12:55 AM | 1 comments
भारत वाले देख रहे थे महायुद्ध के सपने
जो नहीं समझे वह भी समझे जो समझे वह समझे
ऐसी हवा थी युद्ध का खेल ही खेल रहे थे बच्चे
उन्तीस मार्च को बैरकपूर में लड़ गये मंगल पांडे
अब तक याद है फाँसी के फन्दे में ऐंठन गर्दन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 12:54 AM | 0 comments
इस मजमें में एक तरफ से ख्वाजा हसन भी आये
अपने खेमे में बैठे चारों पर्दे सरकाये
रात गये तक लोग आते थे अपने पैर दबाये
आजादी के दीवानों ने अपने पैर जमाये
ऐ दोरी! क्या याद नहीं आती अब तुझको उस सन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुना सत्तावन की
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 12:53 AM | 0 comments
यह सब देख के अंग्रेजों के पाँव की धरती सरकी
सोन किनारे ऐसे ही में झूमके आई दोरी (यह मेला अब भी लगता है)
मेंढे गायें बरघों की जोड़ी (बैलों की जोड़ी) और घोड़ा हाथी
बच्चे कच्चे बूढ़े वाले मर्द के साथ लुगाई (पति-पत्नी)
धूम धड़क्का भीड़ भड़क्का गीत पे ढोलक भी ठनकी
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 12:49 AM | 0 comments
जासूसों ने ढूंढा और इक दस्तावेज निकाली
जिसके हर हर लफ्ज से छलकी खून की गहरी लाली
खून की सुर्खी देख के काँपी रात भयानक काली
आजादी को सींच रहे थे अपने खून से माली
वह कागज था एक कहानी कितने दिलों के धड़कन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 1:28 PM | 0 comments
जासूसों के गोल चले ले लेकर उजले दामन
राम की चीख सुनी तो फौरन धोखा खा गये लछमन
दिल के द्वार से निकली बाहर-सीता देखकर बाह्मन
आजादी की सीता को झटपट हर ले गया रावन
राम की हालत क्या कहिए क्या कहिए हालत लछमन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Posted by डा. फीरोज़ अहमद at 1:27 PM | 0 comments
पटना के अत्राफ (पटना की दिशा में) में फैला छुट पुट यों जो उजाला
दिल ही दिल में घबराया तब अंग्रेजों का अंधेरा
अंग्रेजों ने सर जोड़े और जोड़ के सर यह सोचा
जासूसों को चार तरफ जल्दी जल्दी दौड़ाया
यह है धरती राम की लेकिन कौन कमी है रावन की
सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की
Posted by डा. फ