Sunday, November 22, 2009

राही मासूम रजा और आधा गाँव


- प्रो० जोहरा अफ़जल




राही मासूम रजा एक ऐसे आधुनिक रचनाकार थे जिनकी रचनाओं का मुख्य विषय राजनीति है। चाहे वह उनका उपन्यास हो, कहानी हो, कविता हो अथवा निबन्ध। उनकी सभी रचनाओं में समय की अनुगूँज सुनाई देती है। राही के उपन्यासों में आधा गाँव टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, ओस की बूँद,सीन ७५, दिल एक सादा कागज,कटरा बी आरजू, असन्तोष के दिन और नीम का पेड़ में से सबसे

अधिक चर्चित उपन्यास आधा गाँव है। राही ने इस उपन्यास में गंगौली गाँव की वास्तविक कथा के माध्यम से १९३७ से १९५२ तक के समय के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक यथार्थ और उसकी परिवर्तनशील स्थितियों का वितान रचा है।

राही का यह उपन्यास हिन्दी के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में से एक है। आधा गाँव आधुनिक भारतीय समाज के विभिन्न विषयों को समेटे हुए है। लेखक ने उत्तर प्रदेश के एक गाँव गंगौली के आधे टुकड़े को ही अपना कथा क्षेत्र बनाया है, जिसका वह स्वयं भोगता एवं जानकार है। हिन्दी उपन्यास जगत्‌ में शायद पहली बार मुस्लिम जनजीवन का यथार्थ अपने विविध रंगों में उसकी अच्छी और बुरी परछाइयों को लेकर प्रस्तुत हुआ है, जिसने निश्चित रूप से भारतीय जीवन का एक और पहलू उजागर किया है।

राही अपने गाँव गंगौली से, वहाँ के लोगों से वहाँ के कण-कण से प्यार करते हैं। उपन्यास को पढ़ने पर पता चलता है कि राही गंगौली की मिट्टी की गन्ध में, कीचड़ और गोबर में, गाय और बैलों में, प्राकृतिक शोभा में उतने ही रमते हैं जितने गंगौली के लोगों में। राही भारत की परम्परागत साझा संस्कृति और विरासत के प्रबल समर्थक थे। वे धर्म की राजनीति करने वालों के सदैव विरोधी रहे। उन्होंने आधा गाँव में यह साफ़ कर दिया कि धर्म किसी राष्ट्र की स्थापना का आधार नहीं हो सकता। धर्म और राजनीति का रिश्ता तेल और पानी जैसा है। यदि भारत में

धर्म को राजनीति से जोड़कर सत्ता प्राप्त करने की चेष्टा की गई तो इसके भयानक परिणाम होंगे। राही ने धर्म और जाति की राजनीति करने वालों की कड़ी आलोचना की है। वह हर तरह की संकीर्णता और कट्टरता के सख्त विरोधी रहे, जीवन भर एक सही भारतीयता हिन्दुस्तानियत की खोज करते रहे।

आधा गाँव की कथा गंगौली गाँव के शिया मुसलमानों के परिवारों की है जहाँ अन्य जाति और धर्म के लोग भी रहते हैं। राही ने इसे आंधे गांव की कहानी कहा है पर यदि इसकी गहराई में जाकर देखें तो यह आधे की नहीं, सारे गांव की कहानी है बल्कि यदि पूरे भारत की कहानी कहा जाय तो अनुचित न होगा।

राही ने अपने लगभग सभी उपन्यासों में आने वाले नये समाज की प्रवृत्तियों को पहचाना और अपने लेखन का विषय बनाया तथा उन तमाम समस्याओं का भी चित्रण किया हैं। लेखक आधा गाँव में सपरिवार स्वयं मौजूद रहता है और कहानी का आरंभ भी उसने अपने बचपन से ही किया है। बाल्यावस्था में न समझ आने वाली बातें जिन्हें आज वह खूब समझाता है उनका चित्रण करने में उसे कोई संकोच नहीं होता। आधा गाँव में मध्यवर्गीय जीवन और उस समाज में व्याप्त अनेक विसंगतियों एवं समस्याओं को उकेरा गया है।

आधा गाँव एक आँचलिक उपन्यास है पर इसमें कोई एक कथा नहीं है। राही विभिन्न पात्रों के साथ उनकी अलग-अलग कथा लेकर चलते हैं किन्तु विभिन्न पात्रों तथा इन पात्रों की कहानियों में विभिन्नता होते हुए भी ये एक सुर में बँधे हुए हैं तथा कथानक में कहीं भी शिथिलता दिखाई नहीं देती। जिस समय में इस उपन्यास की रचना हुई और जिस समय की यह कथा है, उस समय शिक्षा की दृष्टि से देश पिछड़ा हुआ था। नवयुवकों को रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर छोड़ना पड़ता था। राही ने आधा गाँव के माध्यम से अनेक प्रश्न पाठक के सम्मुख रखे हैं, ऐसा करने के लिए उन्होंने काल्पनिक पात्रों एवं कथाओं का आश्रय लिया है।

पाकिस्तान के निर्माण के प्रश्न को गंगौली गाँव के हर व्यक्ति की मानसिकता से जोड़ कर सोचने और उस पर विचार करने पर राही ने विवश किया है। गाँव में किसी को भी पाकिस्तान से सहानुभूति नहीं है। गंगौली के मुसलमानों के स्वतन्त्रता से पूर्व खुशहाल जीवन और स्वतन्त्रता के पश्चात्‌ की दयनीय स्थिति का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है, राही ने। उन्होंने मुस्लिम लीग की राजनीति को नहीं स्वीकारा, भारत-पाक के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं किया, पर इसका जो सामाजिक प्रभाव पड़ा उसका अत्यन्त सजीव चित्र प्रस्तुत किया। ÷मुस्लिम लीग' की राजनीति पर जितना सशक्त प्रहार राही ने किया उतना अन्य किसी लेखक की रचना में दिखाई नहीं देता।

भारत और पाकिस्तान का बटवारा राजनीतिक ही नहीं सामाजिक एवं सांस्कृतिक त्रासदी भी है। गंगौली जैसे गाँव के मुसलमान मुस्लिम लीग को वोट देने के बाद भी पाकिस्तान नहीं गये। मिगदाद तो पाकिस्तान जाने से साफ़ इन्कार कर देती है-हम ना जाए वाले हैं कहीं ! जायें ऊ लोग जिन्हें हल-बैल से शरम आती है। हम त किसान है, तन्नू भाई। जहाँ हमरा खेत, हमरी जमीन -वहाँ हम...... 1 तन्नू पाकिस्तान का विरोध करते हुए कहता है - नफ़रत और खैफ़ की बुनियाद पर बनने वाली कोई चीज+ मुबारक नहीं हो सकती ...२

आधा गाँव में समाज के दो रूपों के यथार्थ को राही ने बड़ी बेबाकी से दर्शाया है -एक भारत विभाजन से पूर्व का समाज और फ़िर विभाजन के बाद का। पाकिस्तान बनने की मांग से पूर्व गंगौली गाँव के हिन्दू तथा मुसलमान आपस में सौहार्द पूर्वक रहते थे, भले ही वे दूसरे के यहां खाने-पीने से परहेज करते थे पर मन में कोई नफ़रत या मन मुटाव न था। मुसलमान दशहरा के लिए चन्दा देने में पीछे न रहते। जहीर मियाँ ने मठ के बाबा को पाँच बीघे जमीन माफ़ कर दी, फुन्नन मियाँ ने भी मन्दिर बनवाने के लिए ज+मीन दी थी। ऐसे मुसलमान परेशान थे, सोचने में असमर्थ कि अचानक मुसलमानों के लिए अलग देश की आवश्यकता क्यों पड़ गई। उनके सम्मुख एक बहुत बड़ा प्रश्न देश के बटवारे को लेकर उठ खड़ा हुआ। राही धर्म के नाम पर देश को या देशवासियों को बांटने के पक्ष में नहीं थे। उन्हीं के शब्दों में मैंने दंगों पर रोना बन्द कर दिये है क्योंकि मुझे लाशों को धर्मों के आधार पर बाँटने की कला नहीं आती। मैं केवल यह देखता हूँ कि नागरिक मरा पड़ा है। एक बाप, एक भाई, एक पति, एक माँ, एक बहन, एक बेटी, एक परिवार भरा पड़ा है। घर, हिन्दू या मुसलमान या सिख, हरिजन, या ब्राह्मण नहीं होते। घर तो घर होते हैं।''३

उनकी यहीं भावना आधा गाँव में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। राही साम्प्रदायिकता के विरु( एक आदर्शवादी उपन्यासकार की भाँति अपनी भूमिका निभाना नहीं भूले। उन्हें विश्वास है कि भारत में हिन्दूओं का राज हो जाने पर मुसलमानों पर कोई आपत्ति नहीं आयेगी। यही बात वह आधा गाँव' के पात्र फुन्नन मियाँ के मुख से कहलाते हैं- हां-हां, त हुए बा। तू त ऐसा हिन्दु कहि रहियों जैसे हिन्दु सब भुकाऊ है कि काटलीयन। अरे ठाकुर कुंवरपाल सिंह त हिन्दू रहे। झगुरियों हिन्दु है। ऐ भाई, ओ परसरमुवा हिन्दुए न है कि जब शहर में सुन्नी लोग हरमजदगी कीहन कि हम हजरत अली का ताबूत न उठे देंगे, काहे को कि ऊ शिया लोग और तबर्रा पढ़त हएं, त परसरमुवा ऊधम मचा दीहन कि ई ताबूत उट्ठी और ऊं ताबूत उट्ठा। तेरे जिन्ना साहब हमरो ताबूत उठाये न आये।'यह बात राही ने एक साधारण व्यक्ति के मुख से कहलाकर सिद्ध करने का प्रयास किया है कि साम्प्रदायिक दंगे-फ़साद तो पढ़े-लिखे, शिक्षित राजनेताओं का काम है साधारण जन को इसमें कोई रुचि नहीं।

जिस प्रकार मेरी गंज आंचल के उपेक्षित जीवन को उसकी समस्त कुरूपता को मानवीय स्तर पर फणीश्र्वरनाथ रेणु ने मैला आँचल में चित्रित किया है उसी प्रकार राही मासूम रजा ने पहली बार अपने ही गाँव गंगैली के शिया मुसलमानों की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं का बड़ा ही मार्मिक चित्र आधा गाँव' में प्रस्तुत किया हैं जितना यथार्थ चित्र राही ने मुसलमानों का किया है उतना इससे पहले हिन्दी उपन्यासों में कहीं देखने को नहीं मिलता।

आधा गाँव में स्वतन्त्रता से पूर्व और बाद के गंगौली गाँव का चित्रण है जो उस समय का जीता जागता प्रमाण है - जहाँ स्वार्थी अैर पद्लोलुप नेताओं का अत्यन्त घिनौना रूप दिखाया गया है। उस समय सम्पूर्ण भारत ऐसी ही विसंगतियों का शिकार था। राही ने बड़ी ही संवेदनशीलता के साथ इस तथ्य को उजागर करने का प्रयास किया है। जातिवाद का आधार लेकर जो राजनीति की जाती है उससे समाज का हित कभी नहीं हो सकता। वह एक प्रगतिशील यथार्थवादी साहित्यकार थे, इसीलिए उनके उपन्यास आधा गाँव में सामाजिक यथार्थ का रंग चटख है।

आधा गाँव में जो कुछ भी घटित होता दिखाया गया है वे घटनाएं केवल गंगौली गाँव की नहीं थी बल्कि पूरे भारत में ऐसी ही स्थिति थी। राही का आधा गाँव उपन्यास बहु आयामी उपन्यास है। कोई भी विषय ऐसा नहीं जो इनकी दृष्टि से अछूता रह गया हो। पाकिस्तान का निर्माण देश का विभाजन इस उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु नहीं है फिर भी वह केन्द्रीय वस्तु से इतनी जुड़ी हुई है कि उससे अलगाने में कठिनाई होती है। इस उपन्यास की केन्द्रीय वस्तु है समय की गति। समय ही आधा गाँव का नायक है। राही के अनुसार - यह कहानी न कुछ लोगों की है, न कुछ परिवारों की। यह उस गाँव की कहानी भी नहीं है जिसमें इस कहानी के भले बुरे पात्र अपने को पूर्ण बनाने का प्रयत्न कर रहे है। यह कहानी न धार्मिक है न राजनीतिक, क्योंकि समय न धार्मिक होता है न राजनीतिक और यह कहानी है समय की ही। यह गंगौली में गुजरने वाले समय की कहानी है। कई बूढ़े मर गये, कई जवान कई बच्चे जवान हो गये .... यह कहानी है उन खण्डहरों की जहाँ कभी मकान थे और यह कहानी उन मकानों की जो खण्डहरो पर बनाये गये हैं।४

यह उपन्यास जहाँ एक ओर अभिजात्य मुस्लिम समाज का चित्र प्रस्तुत करता है वहीं दूसरी ओर आजादी के बाद भारत में तेजी से होने वाले परिवर्तनों को भी रेखांकित करता है। राही मासूम रजा एक ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने बड़ी निर्भीकता से राजनीति पर कड़ा प्रहार किया है। इन्होंने बिना किसी झिझक और भय के यथार्थ को अपने साहित्य में दर्शाया है। उनकी इसी निर्भीकता, निडरता और सच्चाई को देखकर धर्मवीर भारती यह कहने पर विवश हुए- अगर मैं ईश्वर पर विश्वास करता होता तो ऐसे क्षण में यही प्रार्थना करता कि प्रभु इस दुस्साहसी की सेवा करना। क्योंकि इसकी सच्ची आवाज में तुम ही बसते हो। मगर किससे प्रार्थना करूँ, अगर ईश्र्वर है तो ये समाज में व्याप्त मिथ्या के खतरनाक व्यूह भी तो उसी की वजह से होगें।५

राही ने अपने सभी उपन्यासों - आधा गाँव, टोपी शुक्ला', ओस की बूँद', हिम्मत जौनपुरी', असन्तोष के दिन, कटरा बी आरजू एवं दिल एक सादा कागज में समाज में व्याप्त समस्त जटिल समस्याओं का चित्रण किया है। जिनमें सबसे बड़ी समस्या है व्यक्ति और समाज की असमानता। वे मानते हैं कि सारी समस्याओं के पीछे व्यक्ति का अपना स्वार्थ होता है। उनके अनुसार जब तक मनुष्य के भीतर ये स्वार्थ रहेंगे तब तक इन समस्याओं से पीछा नहीं छूट सकता। ÷आधा गाँव' में व्यक्ति की इसी समस्या को बड़े सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है राही ने।

हिन्दुओं की तरह मुसलमानों में भी कई प्रकार के सामाजिक भेद हैं। हड्डी की शुद्धता, रक्त की शुद्धता पर भी बहुत जोर दिया जाता है। आर्थिक रूप से चाहे व्यक्ति कितना भी सम्पन्न हो पर यदि उसकी हड्डी में दाग़ है तो उसे समाज में वह स्थान कभी नहीं मिल सकता जो शुद्ध हड्डी वाले निर्धन व्यक्ति को मिलता है। अशरफुल्ला खाँ को अपने पठान होने पर गर्व है -हम ठहरे पठान लोग। हमारे यहाँ तो दोस्ती और दुश्मनी के अलावा कोई और पैमाना ही नहीं होता। दोगली हरकतें करना शेखों और नीच जात वालों का काम है।''६ सैफुनिया से विवाह करने के पश्चात्‌ मिगदाद अपने पिता की खरी हड्डी का चैलेंज करते हुए कहता है बाकी हम्में त इहो मालूम है कि हमहूं सैय्यद ना है। बाकी जना रहा कि अब्बा ई बतिया बिल्कुल ही भूल गये हैं। ऊ त इकद्म्मे से सैय्यद हो गये हैं। और अब त जब से लड़के अब्बा की शेरवानी पा गये हैं तब से अउरो मारे इतराए लगे हैं।७ युवा पीढ़ी में अपने बड़ों के प्रति आदर की भावना कम होती दिखाई दे रही है। गंगौली गाँव में आये दिन पिता-पुत्र, सास-बहू के झगड़े होते रहते हैं। हर परिवार की यही कहानी है।

गंगौली में शिया मुसलमानों के अतिरिक्त राकी मुसलमानों और जुलाहों के घर भी हैं पर उनके साथ शिया लोगों का मेलजोल नहीं है। इस उपन्यास में ऐसे भी चित्र है जिनमें शिया पुरुष हिन्दुओं-भंगी या चमार जाति की स्थितियों से सम्बन्ध रखते है, परन्तु शुद्धता का ऐसा आड्म्बर है कि हिन्दू मरीज की नब्ज देखने के बाद हकीम साहब स्नान करते दिखते हैं। राही ने अपने आधा गाँव में सामाजिक जीवन के जिस पक्ष को अधिक उभारा है वह यही, पुरुषों का नीच जाति की स्थितियों के साथ अनैतिक यौन सम्बन्ध है। मोहर्रम के चाँद के दिखते ही शिया लोगों की शोक सभाएं शुरू हो जाती हैं। इसी प्रकार की एक सभा में सितारा और अब्बास एक दूसरे पर मोहित हो जाते हैं। अब्बास अलीगढ़ मुस्लिम विश्र्वविद्यालय का छात्र है अल्हड़ सितारा के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर उसे भूल जाता है। प्रेम का परिणाम केवल सितारा को ही भुगतना पड़ता है। नारी की स्थिति का अत्यंत सजीव चित्र राही ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया है। स्त्री-पुरुष के अनैतिक सम्बन्धों को भी आधा गाँव में खुलकर दिखाया गया है। सभी पात्र शरीर के भूखे हैं। उन्हें बस शरीर मिलना चाहिए चाहे वह शरीर रिश्ते की बहन का हो, नौकरानी का हो या फिर किसी भी नीच जात का। राही ने परिवारों की, समाज की इन्हीं छोटी-छोटी समस्याओं को एक बड़ी समस्या बनाकर प्रस्तुत किया है। इन्होंने साम्प्रदायिक विभीषिका का चित्रण जितने साहस पूर्ण ढंग से किया है, शायद ही कोई अन्य इतने साहस का प्रदर्शन कर सकें।

इसमें सन्देह नहीं कि साठोत्तरी उपन्यासकारों में राही एक निराला व्यक्तित्व रखते है, जिनमें विद्रोह कूट-कूट कर भरा है। उनके उपन्यासों में नए पुराने द्वन्द्व की नई भंगिमाएं दृष्टिगोचर होती है। आजादी के बाद एक नया नेतृत्व वर्ग विकसित हुआ। इस नये वर्ग के उदय के पीछे कोई परम्परा नहीं, शिक्षा नहीं, सम्पन्नता नहीं। यदि कुछ है तो वह है वोटों का जोड़-तोड़। वोटों का यह जोड़-तोड़ समाज के एक साधारण व्यक्ति को समाज का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सदस्य बना देता है। वह व्यक्ति खुद ही सरकार होता है और सरकार और जनता के बीच सेठ भी। आधा गाँव में एक स्वर जो लगातार सुनाई देता हैं, वह है मुसलमानों का देश प्रेम। वे भी इसी देश का, राष्ट्र का एक हिसा हैं। वे भी अपने घर, अपने गाँव और देश की मिट्टी से उतना ही प्रेम करते हैं जितना अन्य जाति के लोग या देशभक्त को हो सकता है। राही ने भारतीय मुसलमानों की व्यथा और कथा को बहुत ही प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।

राही मासूम रजा ने अपने उपन्यास आधा गाँव में व्यक्त समस्याओं का कोई समाधान प्रस्तुत नहीं किया है। वह चाहते थे कि पाठक स्वयं उचित और अनुचित का निर्णय करे। उन्होंने तो केवल अपने उपन्यास द्वारा मानव मन की कोमल एवं पवित्र भावनाओं को उजागर करके सत्य एवं सद्वृत्तियों को जाग्रत करने का प्रयास किया है। वे एक साहित्यकार थे जिन्होंने कथा साहित्य के क्षेत्र में एक नये क्षितिज की खोज की और हमें एक ऐसे संसार में परिचित कराया जिसे हम गहराई से नहीं जानते थे। उनके तेवरों को शब्दों में नहीं ढाला जा सकता।





सन्दर्भ-सूची



१. राही मासूम रजा, आधा गाँव, पृ० २२६

२. वही, पृ० २६३

३. राही मासूम रजा, लगता है बेकार गये हम, पृ० २२६

४. आधा गाँव, पृ० ११-१२

५. राही मासूम रजा, मैं एक फेरीवाला, भूमिका से, पृ० ९

६. आधा गांव, पृ० १०३


Tuesday, April 14, 2009

हिन्दी के मुस्लिम कथाकार

पुस्तक उपलब्ध

मूल्य 200 (25प्रतिशत छूट के साथ)
भूमिका
डॉ० मेराज अहमद:सम्पूर्ण समाज की अभिव्यक्ति मुस्लिम कथाकार और उनकी हिन्दी कहानियाँ कहानियाँ
हसन जमाल : चलते हैं तो कोर्ट चलिए
मुशर्रफ आलम जौक़ी : सब साजिन्दे

एखलाक अहमद जई : इब्लीस की प्रार्थना सभा
हबीब कैफी : खाये-पीये लोग
तारिक असलम तस्नीम : बूढ़ा बरगद
अब्दुल बिस्मिल्लाह : जीना तो पड़ेगा
असगर वजाहत : सारी तालीमात
मेहरून्निसा परवेज : पासंग
नासिरा शर्मा : कुंइयांजान
मेराज अहमद : वाजिद साँई
अनवर सुहैल : दहशतगर्द
आशिक बालौत : मौत-दर-मौत
शकील : सुकून
मौ० आरिफ : एक दोयम दर्जे का पत्र
एम.हनीफ मदार : बंद कमरे की रोशनी

Wednesday, April 8, 2009

खुश्की का टुकड़ा

- राही मासूम रजा


आदमी अपने घर में अकेला हो और पड़ोस की रोशनियां और आवाजें घर में झांक रही हों तो यह साबित करने के लिए कि वह बिल्कुल अकेले नहीं है, वह इसके सिवा और क्या कर सकता है कि उन बेदर्द रोशनियों और आवाजों को उल्लू बनाने के लिए अपनी बहुत पुरानी यादों से बातें करने लगे।
वह कई रातों से लगातार यही कर रहा था।
अकेला होना उसके लिए कोई नयी बात न थी। उसे मालूम था कि बदन और आत्मा की तनहाई आज के लोगों की तक़दीर है। हर आदमी अपनी तनहाई के समुद्र में खुश्की के एक टुकड़े की तरह है। सागर के अंदर भी है और बाहर भी । और वह इस अकेलेपन का ऐसा आदी हो गया है कि अपनी तनहाई को बचाने के लिए अपने से भी भागता रहता है।
दस-ग्यारह बरस या दस-ग्यारह हजार वर्ष पहले उसने एक शेर लिखा थाः
छूटकर तुझसे अपने पास रहे,
कुछ दिनों हम बहुत उदास रहे।
यह उदासी आधुनिक है हमारे पुरखों की उदासी से बिल्कुल अलग है इसने हमारे साथ जन्म लिया है और शायद यह हमारे ही साथ मर भी जायेगी। क्योंकि हर पीढ़ी के साथ उसकी अपनी उदासी जन्म लेती है।
हमारे युग की उदासी को उदासी कहना, ठीक नहीं है, वास्तव में यह बोरियत है, यह बोर होने वालों की पीढ़ी है, किसी चीज का मजाक उड़ाना भी नहीं चाहता पहले के लोग कैसा मजे में जिया करते थे। पतंग उड़ाते थे- चीजें उड़ाते थे। बाते उड़ाते थे। मजाक उड़ाते थे। आज का आदमी अपने चेहरे के रंग के सिवा उड़ाता ही नहीं ...
और उसके बारे में एक बात मैं यक़ीन से कह सकता हूं कि वह यदि आदमी था तो आज ही का आदमी था। और आज के आदमी को वह डंलपिलो जैसी गदीली तनहाई नसीब नहीं होती कि वह आराम से लेट कर अपनी यादों को छाँटें। सड़ी-गली यादों को अलग कर फटी-पुरानी यादों की मरम्मत करे और अच्छी यादों को धूप दिखला दे।
वह बहुत दिनों से फ़ुरसत के ऐसे मौक़े की तलाश में था परन्तु आज तो मरने की फ़ुरसत नहीं मिलती, जीने की तो बात अलग रही। पहले लोग आराम से बरसों बीमार पडे+ रहा करते थे। सेवा करवा-करवा के सेवा करने का अरमान निकलवाते थे। दूर पास के सारे रिश्तेदारों को इसका मौका देते थे कि वह उनकी पाटी के पास बैठ कर उसकी तारीफ़ करें ... और जब लगभग लोगों को यक़ीन हो जाये कि यह मरने वाले नहीं, तब कहीं जाकर लोग मरा करते है पर अब वक्+त की कमी के कारण हार्ट फेल होने लगे है आधुनिक जिंदगी की भागदौड़ में मरने का चार्म भी बिल्कुल ख़त्म हो गया हैं।
वह हार्ट फ़ेल होने के खिलाफ़ नहीं था। परन्तु हार्ट फेल होने में एक बड़ी खाराबी है। हार्ट फेल होने पर कोई शेर नहीं कहा जा सकता है। इतना समय ही नहीं मिलता कि कोई यह कहे।
उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पर रौनक़ ,
वह समझते है कि बीमार का हाल अच्छा है।
इसीलिए वह चाहता था कि अपनी यादों को क्लासिफाई कर ले। जो वह कवि होता, तो बहुत परेशानी की बात न होती पर शायरी से उसका पुराना बैर था। वह कहा करता था कि शायरी बड़ी असाइंटिफिक चीज होती है। शायरी में मुर्दे बोलते हैं ... कागा सब तन खाइया ... से लेकर कुरेदते हो जो अब आग जुस्तुजू क्या है .... तक मुर्दे टायें-टायें बोल रहे हैं। दिल जो ख़ून पंप करने की एक मशीन है, उसे शायरों ने इतना सर चढ़ाया है कि क्या कहा जाये। प्रेमिका को चंद्रमुखी कहने वाले यह भी नहीं जानते कि चांद पर कैसी-कैसी खाइयां है!
परन्तु जब वह अकेला हुआ तब उसे पता चला कि तनहाई खुद बहुत साइंटिफिक़ नहीं होती। भरीपुरी दुनिया में कोई अकेला कैसे हो सकता है। परन्तु वह अकेला था और वह इस हक़ीक़त को झूठला नहीं सकता था और इसीलिए लगातार अपनी यादों की राख कुरेद रहा था।
कई रातों तक लगातार यादों के जंगल में भटकने के बाद वह इस नतीजे पर पहुंचा था कि आदमी अपनी यादों के बारे में डींगता ज्+यादा है, मेरे पास इतनी यादें हैं और ऐसी ऐसी यादें है। सब झूठ है। बस-दस-बीस यादें होती हैं। जिंदगी का बजट बहुत चौकस होता है। सारी जिंदगी जीने के बाद बचत के ख़ाने में दस-बीस बुरी भली यादों के सिवा कुछ नहीं होता।
पता नहीं लोग जीवनियां कैसे लिखते हैं। उसे तनहाई की चंद रातें गुजार लेने के बाद यकीन हो गया था कि जीवनियां झूठी होती है। लेखक अपने जीवन की कहानी नहीं लिखता। एक कहानी लिखता है। अपने वर्तमान के लिए अतीत का पुश्ता बांधता है। वह अपनी तसवीर को बहुत री-टच करता है। इससे भी काम नहीं चलता तो शायद अपनी गर्दन पर एक नया चेहरा जड़ देता है।
परन्तु वह तो बिलकुल अकेला था। आदमी चाहे दुनिया से झूठ बोल ले पर वह अपनी तनहाई से झूठ नहीं बोल सकता। वह अपने आपसे यह कैसे कहता कि जिन लैलाओं ने उसे धोखा दिया है वह वास्तव में बड़ी वफ़ादार थीं। वह तो अपने आपसे यह भी नहीं कह सकता था कि खुद वह बड़ा वफ़ादार है। उसे कभी अपने आप पर तरस नहीं आया।
उदास होना दूसरी बात है। उदासी तो इस युग के मनुष्य की तक़दीर है। उदासी और झल्लाहट। यही दो शब्द है जो बहरुपियों की तरह रूप बदल-बदल कर आते रहते है। यदि पहचान लिये जायें तो फिर बहरूप ही क्या हुआ!
उसे वह फैंसी ड्रैस शो याद था जिसमें वह अपने वेष में चला गया था। किसी ने नहीं पहचाना। बाद में उसे बताया गया कि एक आदमी ने ग़जब का बहरूप भरा था।
उसी दिन से जब कभी वह यह चाहता कि कोई उसे न पहचाने तो वह अपने चेहरे पर कोई चेहरा चढ़ाये बिना निकल जाता... और फिर उसे आदत-सी पड़ गयीं। उसने अपने चेहरे पर कोई चेहरा चढ़ाना बिलकुल छोड़ दिया। नतीजा यह निकला कि अब उसे कोई पहचानता ही नहीं। एक दिन उसने वह नक़ली मुसकराहट बाक्स से निकाल कर देखी जिसे वह होंठों पर चिपका कर निकला करता था तो यह देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह तो एक बड़ी बेहूदा चीज थी। बेजान। बेमतलब। बेमजा। वह यह सोच कर हँस दिया कि इस मेक-अप में वह कैसा हवन्नाक दिखाई देता रहा होगा। उसने उस मुसकराहट को फिर बक्स में डाल दिया और यह सोचने लगा कि उसकी पत्नी ने इस चीज को संभाल क्यों रखा है! उसे तो सफा+ई का बड़ा शौक़ हैं।
उसकी पत्नी मसर्रत बड़ी सुघड़ और प्यारी लड़की थी। इश्क़ करते-करते थक-हार कर उसने मसर्रत से ब्याह कर लिया था। मसर्रत से उसे न ब्याह के पहले इश्क़ था और न ब्याह के बाद इश्क़ हुआ। और शायद इसीलिए वह उसे सही पर्सपेक्टिव में देख सकता था। इसीलिए वह बरसों इस फ़िक्र+ में रहा कि इस चांद का दाग़ कहां है। गहरी छानबीन के बाद उसे पता चला कि मसर्रत को पुरानी चीजें जमा करने का शौक़ है। उसका बस चले तो नयी साड़ियां बेच कर कबाड़ियें की दुकान से पुरानी साड़ियाँ ख़रीद लाये यह पता उसे खासा-पुराना पति हो जाने के बाद चला। फिर भी पलभर के लिये वह कांप गया कि किसी दिन बोर हो कर वह उसे औने-पौने निकाल कर किसी कबाड़ख़ाने से कोई ऐंटीक पति न ख़रीद लाये।
उसने जब यह बात मसर्रत को बतायी तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी। उसने चोरों की तरह इधर-उधर देखा। बड़ा बेटा ख़ादिम हुसैन सामने ही रेडियोग्राम के पास क़ालीन पर लेटा गुन-गुना रहा था-:
रिमझिम बरसता सावन होगा,
झिलमिल सितारों का आंगन होगा।
छोटी बेटी ख़ातून जो अपनी छोटी गुड़िया के फ्लू से सख्त परेशान थी, बड़ी गुड़िया को डांट रही थी कि वह छोटी को लेकर इस ठंड में घर से निकली ही क्यों ...
ख़ादिम के गाने से बोर होकर वह बोली-भाई मियां, जब सावन रिमझिम बरस रहा है तो यह सितारे कहां से आ गये ?
खादिम सटपटा गया। पर वह छोटी बहन से हार भी नहीं मान सकता था। बड़े गंभीर लहजे में बोला-यह फिल्मी आंगन है।
बेटा-बेटी दोनों मशगूल थे। मसर्रत ने जल्दी से उसकी उस नाक का प्यार ले लिया। जिसका वह बहुत मजाक उड़ाया करती थी और बोली-ईडियट, तुम्हें यही ख़बर नहीं कि हर सुबह को मैं तुम्हें कबाड़ के कमरे में फेंककर दिल में हाथ डालकर एक नया यानी तुमसे भी एक दिन पुराना पति निकाल लेती हूँ!
उसे ठीक-ठीक पता नहीं था कि मसर्रत की बात पर हंसना चाहिए या नहीं, पर वह हंस पड़ा।
ख़ातून का हाथ हंसी की आवाज+ से हिल गया। गुड़िया की दवा ख़ादिम के उजले कुरते पर गिर गयी। ख़ादिम ने उसे एक चांटा मार दिया। उसने ख़ादिम को किचकिचा कर दांत काट लिया। खून छलक आया...
मसर्रत बीच-बचाव करने लपकी। पर भाई-बहन लड़ने के मूड़ में थे दोनों उछल-कूद रहे थे। इस पर मसर्रत को हंसी आ गयी ...
इस मसर्रत के साथ जिंदगी कभी पुरानी नहीं हो सकती। जिंदगी बड़े मजे से गुजर रही थी। बस उस नक़ली मुसकान का ख्याल उसे परेशान किया करता था। एक दिन चुपके से वह उसे एक कबाड़िये के हाथ बेच आया। बात आयी-गयी हो गयी। वह उस मुसकराहट को भूल भी गया। उसके दिल से यह डर जा चुका था कि उसके मरने के बाद यदि उस पर रिसर्च करने वाले को यह मुसकराहट मिल जायेगी तो क्या होगा। यह डर मिट जाने के कारण वह ज्यादा खुल कर हंसने लगा था। दो-एक दिन के बाद मसर्रत ने कहा-बिल्डिंग के लोगों को यह ख्बर करने की क्या जरूरत है कि तुम हंस रहे हो।
वह बोला-अरे तो क्या बिल्डिंग वालों के डर से मैं हंसना बंद कर दूं!
बात बढ़ गयी सोलह बरस के बाद पहली बार बात बढ़ी थी ...
तीन-चार दिन तक दोनों में बातचीत बंद रही। ख़ादिम और ख़ातून ने भी भांप लिया था कि दाल में कुछ काला जरूर है। मसर्रत इस बीच में कई बार उन दोनों से इतनी दबी आवाज में, कि दूसरे कमरे में बैठा हुआ वह यह सुन सके, पूछ चुकी थी कि यदि वह दरभंगा चली जाय तो वह क्या करेंगे ... दरभंगा के नाम सुनकर वह कांप जाया करता था। बात यह थी कि अपनी मां से वह बहुत डरा करता था। वह सौतेली माँ रही होती तो वह सोच कर दिल को समझा लेता कि सौतेली मां से और क्या उम्मीद हो सकती है। परन्तु वह तो उसकी सगी मां थी और वह इकलौते बेटे से ज्यादा इकलौती बहू को चाहती थी।
कई दिन इस उधेड़बुन में गुज+र गये। एक दिन वह घर में सहमा-सहमा आया तो उसने देखा कि मर्सरत की आंखों में एक अजीब-सी चमक है। उसकी तरफ़ मसर्रत ने कनखियों से देखा। खादिम निहायत नया, चुनी हुई आसतीनों वाला कुरता पहने दरवाजे में खड़ा मुसकरा रहा था। ख़ातून गरारा पहने एक हाथ से पायचे और दूसरे से दुपट्टा संभालने में लगी हुई थी।
वह चकरा गया। चकराने का आसान इलाज यह था कि वह सीधा अपने कमरे में चला जाये वह अपने कमरे में चला गया।
पीछे-पीछे मसर्रत भी आयी। उसने कमरे के दरवाजे को अंदर से बंद किया। उसका दिल उछलकर हलक में आ गया। उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि मसर्रत चाहती क्या है।
-सुनते हो ? मसर्रत ने कहा। क्या बेहूदा सवाल है, इन हिन्दुस्तानी बीवियों को आखिर कब बात करना आयेगा ?
-क्या सुनूं ? उसने बड़ी भलमनसाहट से पूछा।
-नहीं सुनते तो मत सुनो, मसर्रत चमक गयी। मेरी जूती को क्या गरज पड़ी है। मैं ही पागल हूं कि दो दिन से मारी-मारी फिर रही थी।
-क्यों
-तुम्हारी सालगिरह के लिए और क्यों।
-मगर मेरी सालगिरह के लिए मारे-मारे फिरने की क्या जरूरत है। सालगिरह तो राशंड है, साल में एक ही बार मिलती है। चोर बाजार से एक आध सालगिरहें ख़रीद लायीं क्या !
उसका ख्याल था कि यह सुन कर मसर्रत जमीन-आसमान एक कर देगी। पर वह तो हंसने लगी। हंसते-हंसते बेहाल हो गयी।
हाल में आयी तो बोली- भई मुझे ख्फ़ा रहना नहीं आता।
-तो मान जाओ।
-मान गयी। मगर तुम तो बड़े वह।
-वह क्या!
-मेरा सिर। आज तुम्हारी सालगिरह है।
- सार्टिफिके+ट वाली कि असली वाली।
-मैं तुम्हारे लिए बड़े ग़जब की चीज लायी हूँ।
-तुम हमेशा ग़जब की चीज लाती हो।
-देखोगे तो फड़क जाओगे।
-अच्छा!
-हां।
वह मुसकरा दिया।
-तुम्हारी मुसकराहट बड़ी फटीचर है।
-आदत पड़ गयी है।
-छोड़ दो। जैसे सिगरेट छोड़ दी।
-ग़लत। मैंने सिगरेट को नहीं छोड़ा है। सिगरेट ने मुझे छोड़ दिया है। तंबाकू पर टैक्स इतना बढ़ गया है कि सिगरेट का ख़र्च और मकान का किराया बराबर हो गया है। पर अभी तक हंसना फ्री हैं। तो मैं अडल्ट्रेटेड या इंफ़ीरियर मुसकराहट क्यों इस्तेमाल करूं ? आगे न कह सका क्योंकि मसर्रत की हथेली पर उसकी वह पुरानी मुसकराहट चमक रही थी जो एक दिन चुपचाप कबाड़िये की दुकान पर बेच आया था।
उसकी आंखें हैरत से फैल गयीं।
-चकरा गये ना, वह लहक कर बोली। मैं खुद इसे देख कर फेंक गयी थी। बिलकुल तुम्हारे होंठ के नाप की है। उस गंवार कबाड़िये ने इस पर वार्निश जरा ज्यादा कर दी है। मगर चलेगी तुम्हारे रंग से भी मैच खाती हैं। मैं उससे कह आयी थी कि कलर होंठ में फिट नहीं होगा तो लौटा दूंगी ...
जहिर है कि अपनी वर्षगांठ के दिन वह उस मुसकराहट को स्वीकार नहीं कर सकता था।
वह मुसकराहट अब भी ड्रेसिंग टेबिल पर पड़ी हुई थी। उसी के पास मसर्रत की एक तस्वीर थी। वह ख़ातून को गोद में लिये हंस रही थी। वह ड्रेसिंग टेबिल की तरफ़ बढ़ा देर तक वह वार्निश की हुई उस मुसकराहट की तरफ़ देखता रहा। मसर्रत के बग़ैर अकेला रहना नामुमकिन था। उसने वह मुसकराहट अपने होंठो पर चिपका ली। सोचा कि फ़ौरन मसर्रत को एक ख़त लिखना चाहिए क़ाग़ज मिल गया। कलम नहीं मिल रही थी। कलम के केस में ख़ातून की गुड़िया का जहेज+ रखा था ... वह ढूंढते वह थक गया। आख़िर उसने मसर्रत के डे्रसिंग टेबिल की दराजें खखोड़ी। आखिरी दराज में उसे एक अजीब चीज मिली- मसर्रत जल्दी में अपने कहकहों का पूरा सेट भूल गयी थी। वह खिलखिला कर हंस पड़ा।
थोड़ी देर के बाद पड़ौस के लोग जाग गये। उन्होंने दरवाजा पीटना शुरू किया। परन्तु वह हंसता रहा। वह चाहता था कि अपनी हंसी रोक ले। पर जैसे टेढ़ी सुराही से पानी गिरना बंद नहीं होता उसी तरह उसके मुंह से क़हक़हा बह रहा था।
मसर्रत के क़हक़हों का सेट उसके हाथ में था। हंसते-हंसते वह खिड़की तक आ गया। बहुत नीचे सड़क रोशनी की एक लकीर की तरह पड़ी हुई थी। मसर्रत के क़हक़हों का सेट हाथों से फिसल कर खिड़की के बाहर जा पड़ा। उन्हें बचाने के लिये उसने हाथ बढ़ाया। वह हाथ नहीं आये, वह उन्हें बचाने के लिए झुकता ही चला गया।
सड़क एक दम से उछली और उससे टकरा कर टूट गयी।



Tuesday, April 7, 2009

सिकहर पर दही निकाह भया सही

- राही मासूम रजा


मीर जामिन अली बड़े ठाठ के जमींदार थे। जमींदारी बहुत बड़ी नहीं थी। परन्तु रोब बहुत था। क्योंकि दख्ल और बेदख्ली का जादू चलाने में उन का जवाब नहीं था।
मीर साहब ने उस्ताद लायक अली से गाने के सबक लिये थे और ईमान की बात यह है कि खूब गाते थे। संगीत उनके गले में उतरा हुआ था। बड़ी-बड़ी मशहूर गानेवालियां महफिल में उन्हें देख लेतीं तो कान छूकर । गाना शुरू करतीं। बड़ी बांदी जैसी गानेवाली का शिकार ही उन्होंने रसीली आवाज से किया था, वरना कहां खलिसपुर के ठाकुर साहब कहां मीर जामिन अली। बड़ी बांदी उनकी आवाज पर मर मिटी थी । परन्तु जब वह असमियों को गाली देते तो उनकी आवाज का रूप बदल जाता। जेठ की गर्म हवा की तरह उनकी दी हुई गालियां जिसके पास से गुजर जाती, उसको झुलस देती। और चूंकि वह कोई छोटा काम करना पसंद नहीं करते थे। इसलिए छोटी गालियां भी नहीं देते थे। गाँववालों को उनकी गालियों से बहुत-सी ऐसी बातें मालूम हुई थी, जो औरों को शरीर-विज्ञान के बड़े-बड़े पोथे पढ़कर भी मालूम नहीं हो सकती। अफसोस कि उनके जीवन में किसी को यह ख्+ायाल न आया और उनकी गालियां उन्हीं के साथ मर गयी।
ये मीर जामिन अली बड़े रख रखाव के आदमी थे। जिंदगी भर नमाज+ पढ़ते रहे गालियां बकते रहे और गुनगुनाते रहे और चूंकि वे खुद परम्पराओं का ख़याल रखते थे इसलिए उनका ख्याल था कि जीवन भी परम्पराओं का ख़याल रखेगा। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। वे परिवर्तन के विरोधी थे इसीलिए उनका कहना यह था कि कांग्रेस वाले भपकी दे रहे हैं। जमींदारी भला कैसे ख़त्म हो सकती है! चुनांचे वे गालियां बकते रहे, मुश्कें कसवाते रहे, बेगार लेते और अल्लाह का शुक्र अदा करते रहे... परंन्तु एक रात को मिट्टी के तेल की तरह जमींदारी ख़त्म हो गयी। लालटेन भबक के बुझ गयी और घर में अंधेरा हो गया।
यह घर बहुत बड़ा था। इस घर में छह शताब्दियां रहती थीं। छह शताब्दियों में बकी जानेवाली गालियां रहती थीं। छह शताब्दियों के किसानों की सिसकियां रहती थीं। इसीलिए जब अंधेरा हुआ तो मीर जामिन अली डर गये। वे अंधेरे से नहीं डरे। वे डरे छह शताब्दियों की अनगिनत परछाइयों से, जो एकदम से जी उठी थी, जो मीर साहब अकेले रहे होते तो शायद इन परछाइयों से डर कर मर गये होते। परन्तु वे अकेले नहीं थे, एक बीवी थी। दो बेटियाँ थीं। एक पुश्तैनी नौकरानी थी। एक उस का बेटा था...
परन्तु इस रात में उन्हें कोई शक नहीं था कि अब वे अपने गांव में नहीं रह सकते थे। चुनांचे वे शहर उठ गये। जाहिर है कि शहर में उन्हें उतना बड़ा मकान मिल नहीं सकता था। जितने बड़े मकान में रहने के वे आदी थे। उनका घर इस शहर से पुराना था इसलिए मीर साहब की आत्मा शहर में समा नहीं रही थी।
किराये के जिस घर में वे सब आबाद हुए वह एक छोटा-सा दोमंजिला मकान था। एक छोटा-सा आंगन था। मीर साहब जब गर्मी की पहली रात गुजारने के लिए उस आंगन में लेटे तो उन्हें ऐसा लगा कि जैसे चारों तरफ खड़ी ऊँची हुई दीवारें गर्दन झुका-झुका कर उन्हें देख रही हैं और आपस में इशारे कर के मुस्करा रही है।
मीर साहब घबरा कर उठ बैठे। उन्हें प्यास लग रही थी। वे घड़ौंची की तरफ चले। रास्ते में एक पलंग पर उन्हें बड़ी बेटी रुकय्या की नींद मिली, जो उसकी जवानी का बेचुना दुपट्टा ओढ़े करवटें बदल रही थीं फिर उन्हें दूसरी बेटी रजिया का बचपन मिला। दस-बारह साल की रजिया नींद में बड़बड़ा रही थी कि उसे यह घर बिल्कुल पसंद नहीं...तीसरे पलंग पर उनकी पत्नी आमेना थी, वह जाग रही थी। फिर घड़ौंची थी और घड़ौंची के उधर एक बंसखट पर मत्तो लेटी नींद में बांस का चर्खीदार पंखा झल रहीं थी। और आख़िर में, बिल्कुल दीवार के पास मत्तो का बेटा शौकत सो रहा था।
मीर साहब ने ठंडे झज्जर को छुआ। झज्जर की ठंडक उनके बदन में समा गयी। थोड़ी देर तक वे झज्जर पर हाथ रखे खड़े रहे। फिर चांदी के नक्शीन कटोरे में पानी उड़ेल कर उन्होंने एक ही सांस में कटोरा खाली कर दिया।
वे आमेना के पलंग के पास रुक गये। उन्हें मालूम था कि वह जाग रही है। आमेना सांस रोके पड़ी रही। मीर साहब पट्टी पर बैठ गये। पट्टियाँ बोल उठीं- आमेना घबरा कर उठ बैठी।
''अरे, क्या करते हो। बगल में जवान बेटी सो रही है, जाग पड़ी तो क्या सोचेगी दिल में।''
लेकिन मीर जामिन अली को इसमें कही ज्यादा महत्त्वपूर्ण बातों ने परेशान कर रखा था...दुनिया क्या सोचेगी यदि जल्द रुकय्या का ब्याह न हो गया। उन्हें याद था कि उनकी बहनों की शादियाँ नवें बरस हो गयी थीं। इस हिसाब से तो अब तक रजिया की शादी को दो बरस पुरानी बात हो जाना चाहिए था। परन्तु बेटी की उम्र बड़ी बेहया और बेदर्द होनी है। मुंह पर चढ़ी आती है।
मीर साहब शहर आने से पहले वहां गाँव में भी रुकय्या की शादी की फिक्र के चटियल मैदान में रातों की नींद को हापता देख चुके थे। लड़का मिलता। तो खानदान न मिलता खानदान मिलता तो लड़का न मिलता। और फिर तो ऐसा हुआ कि ऐसी तेज हवा चली कि लड़कों को सीमा पार उठा ले गयी। मांग यहाँ रह गयी, सिंदूर लगानेवाली उंगलियाँ उधर चली गयी। जिन घरों में कल तक लड़के रहा करते थे, उनमें कस्टोडियन का प्रेत बस गया था। अब वे किसी धुने जुलाहे से तो अपनी बेटी ब्याह नहीं सकते थे। और कुछ दिनों के बाद रजिया की जवानी भी सब को दिखायी देने लगेगी, इसी डर से उन्होंने रजिया को गांधी मेमोरियल मुस्लिम गर्ल्स हायर सेकेंड्री स्कूल में दाखिला करवा दिया था। अब कम से कम वे कह सकते थे कि बच्ची अभी पढ़ रही हैं। परन्तु रुकय्या के कुंवारेपन के लिये तो उनके पास कोई बहाना भी नहीं था।
''रुकय्या के लिए म्यां शम्सुल का रिश्ता मान लेने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया है।'' मीर साहब ने आमेना की बात अनसुनी करते हुए कहा। आमेना घबरा कर उठ बैठी।
''सठिया गये हो क्या?'' उसने तकिये के नीचे से दुपट्टा निकाल कर ओढ़ते ओढ़ते पूछा, ''तुम खुद कहते हो कि शम्सुल मियां तुम से तीन-चार साल बड़े है।''
''क्वांरी रह जाने से अच्छा है कि लड़की बेवा हो जाये,'' मीर साहब ने कहा।
उस छोटे से आंगन में सन्नाटा हो गया। पट्टी की चरचराहट सुनकर जाग उठनेवाली रुकय्या के दिल में भी सन्नाटा हो गया। आंगन में सन्नाटा इतना गहरा था कि कोई गिरता तो डूब जाता।
पलंग की पट्टी फिर चरचरायी। रुकय्या ने आंखें बंद कर लीं। वह मीर साहब की चाप सुन सकती थी। चाप उसके पलंग के पास आकर रुक गयी रुकय्या का गला सूख गया था। वह थूक घूटना चाहती थी। परन्तु इस डर से थूक नहीं घूंट रही थी कि कहीं बाबा देख न लें।
पल भर के बाद चाप दूर चली गयी।

दूसरे दिन रजिया ने स्कूल में अपनी सहेलियों को यह बात बतायी कि उसकी आपा की शादी होनेवाली है किसी शम्सुल मियां के साथ।
''क्या वे कोई बहुत बड़े आदमी है?'' किसी साथी ने पूछा।
''बहुत बड़े आदमी है जनाब,''रजिया ने गर्दन अकड़ा कर कहा, ''बाबा से भी चार साल बड़े हैं।''
रजिया बहुत खुश थी कि उसकी आपा का ब्याह होनेवाला है। अपनी खुशी में उसने इस बात को कोई महत्त्व नहीं दिया कि रुकय्या को चुप लग गयी है या यह कि जब देखीं तब अम्मां की आँख में कुछ न कुछ पड़ जाता है या यह कि बाबा ने डांटना बिल्कुल बंद कर दिया है। वह तो स्कूल से आती और मत्तो के पास बैठ कर आपा की शादी की बातें करने लगती। वह यह सोच -सोच कर खुश हुआ करती कि दूल्हा भाई को वह कैसे-कैसे छकायेगी।
पास ही चटाई पर बैठा बीड़ी बनाता हुआ शौकत ये बातें सुनता रहता और कहीं-कहीं बोल पड़ता।

शौकत को खड़े नाक नक्शेवाली यह सांवली-सी रजिया बहुत अच्छी लगती थी। रजिया उसे हमेशा से पसंद थी। वह कोई छह -सात साल का था। और मत्तो नहलाने-धुलाने के बाद उसे ईद का जोड़ा पहना रही थी। तब उसकी बड़ी बहन जीनत फेकू मियां के लड़के के साथ पाकिस्तान नहीं भागी थी। उसने कहा था, ''तैं त अइसा सजा रही सौकतवा के कि जना रहा कि ई अभई जय्यहे और पंचफुल्ला रानी को बिआह लिअय्यहे!'' यह सुन कर उसने अपनी बहन की तरफ बड़ी हिकारत से देखकर कहा था। ''हम पंचफुल्ला रानी ओनी से बिआह ना करे वाले है। हम न भय्या रजिया बहिनी से बिआह करेंगे।'' यह सुन कर कंघी करता हुआ मत्तो का हाथ रुक गया था। उसने एक तमाचा मारा था। आठ साल बाद भी रजिया को देखकर वहां अब भी हल्का-हल्का दर्द होने लगता था। जहां मत्तो का तमाचा पड़ा था।
शौकत ने कनखियों से रजिया की तरफ देखा वह अपनी ओढ़नी का साफा बांधे रुकय्या का दूल्हा बनी बैटी थी। फिर वह खुद ही मौलवी बन कर निकाह पढ़ने लगी। सिकहर पर दही निकाह भया सही...
जाहिर है कि सिकहर पर दही कहने से निकाह नहीं हो जाता। रुकय्या का निकाह तो बाकायदा दो मौलवियों ने अरबी में पढ़वाया।
शम्सू मियां बड़े ठाठ की बरात लाये। चढ़ावा देख कर मुहल्लेवालों की आँख खुल गयी। पांच मन मेवा। इक्कीस मन चीनी इक्यावन जोड़े। एक जोड़ा मुरस्सा। जड़ाऊ नथ।
रजिया का जी चाहा कि वह खुद शम्सू मियां से ब्याह कर ले। छोटा-सा घर उसकी सहेलियों से भरा हुआ था। मिरासनें गालियों गा रही थीः
सुन रे वन्नो तेरी बहिना को आख़िर,
ले भागा थानेदार।
डुग्गी बाजे।
गालियों के भीड़-भड़क्के में रजिया लोगों की आँखें बचा-बचा कर खूब पान खा रही थी।
सड़क पर रायसाहब के हाते में बरात शार्मियाने के नीचे खिलौनों की किसी दुकान की तरह सजी हुई थी। शम्सू मियां भारी सेहरे में मुँह छिपाये जापानी बबुए की तरह मौलाना की बात सुन कर सिर हिलाने लगे। शौकत उस जापानी बबूए की तरफ टकटकी बांधे देख रहा था। उसे दूल्हा मियां बिल्कुल पसंद न आये। वह बड़ी बहिनी को बहुत चाहता था। और जब मौलाना रुकय्या से शम्सू मियां का निकाह पढ़ रहे थे, वह यह सोच रहा था कि कहीं मीर साहब छोटीओं बहिनी को कोई बुड्ढे से न बियाह दें... परन्तु शादी के हंगामों में यह कौन सोचता है कि एक पुश्तैनी नौकरानी का छोकड़ा शौकत क्या सोच रहा है। और शौकत के सोचने या न सोचने से फ़र्क ही क्या पड़ सकता है। शौकत का घबराना पिछली तीन शताब्दियों से मीर साहब के घराने में नौकरी करता चला आ रहा था। मीर जामिन अली के घराने का कोई न कोई आदमी काम कर रहा था। सच्ची बात यह है कि अब इन लोगों की है हैसियत केवल नौकरी की नहीं थी। ये बराबर बैठ नहीं सकते थे परन्तु घरवालों में गिने जाते थे। इन लोगों को तनखाह भी नहीं मिलती थी। इन्हें जेब खर्च मिलता था। और साल में दो बार जब घरवालों के कपड़े-लत्ते बनते थे, तो इनके लिए भी जोड़े तैयार होते। यही कारण है कि मीर साहब के घराने की औरतें शौकत के घराने के मर्दों से पर्दा भी नहीं करती थी। और इसीलिए शौकत को यह हक था कि रुकय्या और शम्सू मियां की शादी पर दिल बुरा करे। और इसीलिए जब बरात चली गयी और घर में सन्नाटा हो गया, तो शौकत ने मीर साहब से दिल की बात कह दी। ''ए मियां, बड़की बहिनी के वास्ते ए से अच्छा दुलहा ना मिल सकता रहा का?''
मीर जामिन अली का रात का खाना खाने के बाद हुक्का पीने की तैयारी कर रहे थे। हुक्के की नय की तरफ बढ़ता हुआ उनका हाथ रुक गया। उन्होंने शौकत की तरफ देखा। शौकत झुका हुआ गट्टा दबा रहा था। परन्तु उनकी आँखों का रंग देख कर मत्तो का दिल धक से हो गया।
''उसे क्या घूर रहे हो?'' आमेना आड़े आ गयी, ''सारी दुनिया यही कह रही है। शम्सू मियां का छोटा बेटा अपनी रुकय्या से चार साल बड़ा है। इस ब्याह से अच्छा तो यह होता कि हम उसे चुपके कुछ खिला कर सुला देते।''
रजिया जरा दूर थी। उसने केवल यह सुना कि रुकय्या को कुछ चुपके से खिलाने की बात हो रही है तो वह जहां थी वहीं से चिल्लायी, ''हम भी खायेंगे।''
''मैंने तो खैर रुकय्या की शादी कर दी है। तुम चाहो तो रजिया को कुछ खिला दो।'' यह कहते हुए उन्होंने हुक्के की नय सीधी कर दी और बेटी की तरफ देखे बिना उठ कर बाहर चले गये।
और यूं मर्दाने में ज्यादा समय बिताने के दिन शुरू हो गये। अब जो मीर साहब ज्यादातर बाहर रहने लगे तो घर में रजिया और अकेली हो गयी। उसकी समझ में नहीं आता था कि इस छोटे से एक्के मकान में वह सुबह को शाम और रात को दिन में कैसे बनाये।
नीचे तो उसे वह रत होती थी। इसलिए वह ज्यादातर ऊपरवाले कमर में रहती। आमेना डाँटती रहती परन्तु वह जब भी मौका मिलता आँखें बचा कर ऊपर सरक जाती।
ऊपरवाला कमरा उसी की तरह छोटा था और छोटी-छोटी दो खिड़कियों की आँखों से हर वक्त सड़क को देखता रहता था। यही दोनों खिड़कियां रजिया की आत्मा में खुल गई। कभी-कभी तो उसे ऐसा लगता जैसे सड़क उसके दिल के बीचोंबीच से गुजर रही है। वह बहुत से लोगों की आवाजें पहचानने लगी थी। इन आवाजों पर वह रिऐक्ट भी करती थी क्योंकि इन आवाजों से उनका एक तरफ का नाता हो गया था। कई आवाजों का तो उसे इंतजार-सा रहता था। एक तो वह बुड्ढ़ा था। जिसके गले में बदलगम की गिरह पड़ती थी। वह खिड़की के नीचे आने से जरा एक पहले गला साफ़ करता था। उसकी खांसी की आवाज सुनकर रजिया का जी गंगना जाया करता था। फिर व ऐन खिड़की से नीचे, सड़क के उस पार रुक जाया करता था। दोपहर का समय होता। सड़क वीरान होती। पहले व दाहिने-बायें देखता और निगाह को दाहिने से बायें ले जाने में वह चुपके से यह भी देख लेता कि वह खिड़की पर है या नहीं। पूरा इत्मीनान करके व आँखे झुकाये-झुकाये हुए खिड़की की तरफ मुँह किये हुए कमरबन्द खोलने लगता। उसके हाथों की जुंबिश के साथ-साथ रजिया का मुँह लाल होने लगता। फिर उसे ऐसा लगता। जैसे उसके कान की लवें फट जायेंगी और वह अपने खून से लथ-पथ हो जायेगी। परन्तु वह उस खांसते हुए बूढ़े से अपनी निगाह न हटाती। फिर भी एक पल ऐसा आता जब उसकी निगाह झुक जाती वह बूढ़ा मुंह फेर कर नाली के किनारे उकड़ू बैठ जाता। रजिया चुपचाप वही बैठी रहती और उस बढ़े की पीट की तरफ देखती रहती। कोई मिनट डेढ़ मिनट के बाद वह उठता। यदि कोई आता जाता दिखाई देता तो वह जल्दी चल देता और जो सड़क पर सुनसान रहती तो वह काफी देर लगाता और दाहिने-बायें देखता रहता और दाहिने से बायें जाने में उसकी चिपचिपाती हुई निगाहें रजिया के चेहरे पर अपनी निगाहों का लस छोड़ जाती। वह चला जाता और रजिया के गाल देर तक चिपचिपाते रहते। सड़क फिर वीरान हो जाती और वह रीगल टाकीज के इश्तहारवाले रिक्शे की राह देखने लगती। लाउडस्पीकर पर गूंजती हुई आवाज+ उसके खून की रफ़तार बढ़ा देती।
आज देखिए महबूब प्रोड्क्शन की आन दिलीप कुमार, निम्मी, नादिरा, नौशाद का म्यूजिक जो आपके दिल में बरसों गूजता रहेगा... रोजाना तीन शो फ्री पास बिल्कुल बंद...''
पहले आवाज दूर से पास आती। फिर बिल्कुल खिड़की के नीचे-नीचे आ जाती और फिर दूर जाते-जाते बिल्कुल गायब हो जाती। और वह यह सोचती रह जाती कि आख़िर यह दिलीप कुमार कौन है। निम्नी क्या चीज है... स्कूल में किसी से पूछने की हिम्मत। दिलीप कुमार, राजकपूर देवानन्द... कैसे अजीब नाम है। जैसे कोई दूर से नाम ले कर पुकार रहा हो...इन नामों के बारे में सोचते-सोचते न जाने कितना समय बीत जाता। वह उस लड़के की आवाज+ सुन कर चौंकती, जो रोज खिड़की के नीचे आकर रुक जाया करता था और उसकी तरफ देख कर कहा करता था...जो कुछ वह कहा करता था उसे याद कर के भी वह पसीने-पसीने हो जाया करती थी। इसलिए उसकी आवाज सुनते ही वह एक बार तो उनकी तरफ देखती और फिर बगटुर नीचे भागती...
रात को वह अजीब-अजीब ख़वाब देखती और लाउडस्पीकर की आवाज आती रहतीं। उसने कभी लाउड स्पीकार को ख़वाब में नहीं देखा।

उसकी आँख खुल जाती। हलक में कांटें पड़ चुके होते। जबान सूख कर ऐंठी हुई मिलती। वह पानी पीने के लिए उठती। पलंग चरचराता। वह डर कर फिर बैठ जाती। फिर बहुत धीरे-धीरे उठती और घड़ौंची के पास जा कर खड़ी हो जाती और खबर सोये हुए शौकत की तरफ देखने लगती...
दिलीप कुमार, राजकपूर और देव आनंद तो पता नहीं कौन थे। और कैसे थे। परन्तु शौकत तो शौकत ही था। सामने पड़ा बेखबर सो रहा था। गहरा सांवला रंग। बड़ी-बड़ी बंद आँखें, गोल नाक। अच्छे खासे मोटे होंठ। ऊपरी होंठ पर नर्म सुर्मइ रोयें की एक लकीर। मैला बनियान। चारखानेदार बैंगनी लुंगी...
रजिया को पता भी न चला कि जागती हुई आवाजें सुनते-सुनते और सोये हुए शौकत को देखते-देखते वह कब जवान हो गई। वह यह तो जानती थी कि उसमें कोई परिवर्तन हो रहा है। परन्तु उसे यह मालूम नहीं था कि इस परिवर्तन का नाम क्या है।
इसीलिए यह कहना ठीक नहीं कि रजिया को शौकत से प्यार हो गया था। रजिया तो यह सोच भी न सकती थी कि वह अपनी मत्तो बुआ के लड़के शौकत से प्यार कर सकती है। परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं कि वह शौकत से बेख़बर थी। वह उसे दिन को तो नौकर दिखाई देता, परन्तु रात को जब वह घड़ौंची के उधर सोता दिखाई देता तो उसमे कुछ और ही बात पैदा हो जाया करती थी। वह दिलीप कुमार, राजकपूर और देवआनन्द हो जाया करता था। और वह देर तक भरा हुआ कटोरा हाथ में संभाले उसकी तरफ देखती रहा करती थी। भरा हुआ कटोरा संभाले इसलिए कि जो कोई जाग पड़े तो यह देख सके कि वह पानी पीने उठी है।
जाड़े की रातें अलबत्ता बहुत परेशान करती थीं। क्योंकि उन रातों में वह सोता तो उसी दालान में था जिसमें घड़ौंची हुआ करती थी,परन्तु जाड़े की रातों में हर रात प्यास जो नहीं लग सकती। फिर भी गयी रात को उसकी आँख जरूर खुलती। वह बाहर निकलती। लोटा उठाती और गुसलखाने की तरफ चली जाती। वहाँ पानी बहा कर फिर लौट आती। परन्तु शौकत में एक बुरी आदत यह थी कि वह मुँह छिपा कर सोया करता था। तो जी कड़ा करके वह लोटा उठाने और फिर लोटा रखने में खास शोर करती, कि शायद शौकत की आंख खुल जाये और वह सिर से लिहाफ सरका के देखे। परन्तु वह तो जैसे हाथी घोड़े बेच कर सोया करता था। वह लाख कोशिश करती परन्तु शौकत की आँख न खुलती तो उसे मजबूरन कमरे में जाकर लेट जाना पड़ता। वह जाकर लेट जाती। परन्तु देर तक जागती रहती और लाउडस्पीकर गूंजनेवाली आवाज सुनती रहती।
रजिया में होनेवाली इस परिवर्तन की खबर घर में किसी को नहीं थीं। रुकय्या होती तो शायद उसके बदन में मचलती हुई अंगड़ाईयों की आहट सुन लेती। परन्तु वह तो शम्सू मियां के साथ पाकिस्तान जा चुकी थीं। जहाँ शम्सू मियां का बड़ा बेटा किसी बड़ी नौकरी पर था। शम्सू मियां मांगे का चढ़ावा लाये थे। पाँच हजार का कर्ज छोड़ कर एक रात चुपचाप चले गये थे।
तो रजिया किसे बताती कि एक अजीब प्यास लगती है और वह प्यास उसे गयी रात को जगा देती हैं। वह घर में अकेली थी। उसके दिल की भाषा समझने वाला कोई नहीं था। और शायद उसकी जिदंगी इसी बेजबानी में कट गई होती। परन्तु एक दिन एक बड़ी साधारण-सी बात ने सुबह की नर्म हवा की तरह उसे छू दिया और उसका सारा बदन जवान बन गया।
हुआ यह कि मत्तो बावर्चीखाने के दर पर बैठी मसाला पीस रही थी आमेना शाम की नमाज पढ़ रही थी। रजिया दालान में एक खुरें पलंग पर लेटी कुछ गुनगुना रही थी कि शौकत आया उसके हाथ में कई चीजें थीं।
''छोटी बहिनी तनी इ पान ले ल्यो'' शौकत ने यह कह कर वह हाथ उसकी तरफ बढ़ाया, जिसमें पान था, वह कोई खास बात न थी। कई बार यह हो चुका था कि जब मत्तो किसी काम में फसी होती वह बाजार से लाई हुई चीजें रजिया को दे देता। परन्तु शाम को खास बात यह हुई कि पान लेते वक्त रजिया का हाथ शौकत के हाथ से छू गया। पलभर से भी कम की बात थी। शौकत मुड़कर बावर्चीखाने की तरफ चला गया। परन्तु रजिया जहां की तहां खड़ी रह गयी। उसका सारा बदन झनझना रहा था। और व पान के हरे-हरे पत्तों की तरफ यूँ देख रही थी। जैसे उन्होंने कोई शरमा देने वाली बात कह दी हो।
उस शाम के बाद से ऐसा होने लगा कि व शौकत के बाज+ार से आने की राह देखने लगी। शौकत को आता देख कर वह चीजें लेने के लिए झटपटाती। इस बात पर न तो मत्तो ने ध्यान दिया और न आमेना ने। इसलिए शौकत चीजें लेकर आता रहा। रजिया वह चीजें लेती रही। हाथ से हाथ टकराहट रहा। बदन झनझनाता रहा और तब वह एक दिन वह यह जान कर शरमा गई कि शौकत अब चीजें लेकर ऐसे समय पर लेकर आता है, जब मत्तो मसाला पीस रही होती और आमेना नमाज+ पढ़ रही होती है। वह जो शरमाई तो शौकत ने उसकी उगंलियां जरा-सी दबा दी। और पहली बार उसने रजिया की तरफ देखा। ठीक उसी वक्त रजिया ने उसी तरफ देखा। वह मुस्करा दिया।
अभी तक इन दोनों को वह यह मालूम था कि वह एक दूसरे से प्यार करने लगे हैं। रजिया को तो खैर यह मालूम ही नहीं था कि प्यार होता क्या है। मगर शौकत हिन्दी फ़िल्में देखता रहता है। तो उसे उन फ़िल्मों पर बड़ा भरोसा होता था। वह अक्सर रजिया को कामिनी कमसिन और मधुबाला और नर्गिंस के सपनें देखता और खुद दिलीप कुमार, विनोद कपूर बनता। इसलिए उसे यकीन था कि उसे रजिया से प्यार नहीं हुआ है, क्योंकि उसने तो रूपहरे पर्दे पर प्यार से लबरेज सीन देखे थे। जो हाथ छूने में इतने दिन लगने लगें तो हो चुकी मुहब्बत परन्तु इसमें शक नहीं कि उसे रजिया का हाथ छूने में बड़ा मजा आता था। वह उस एक पल की उम्मीद में सारा दिन गुजारा करता था। इसीलिए किसी दिन जो उसका हिसाब जरा ग़लत हो जाता और मत्तो साली मिलती तो उसका मुँह उतर जाता और शायद दिलो की बात आगे न बढ़ती यहां से, क्योंकि यह दोनों ही इस बात से बेख़बर थे कि उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया है। परन्तु गर्मी की एक शरीर दोपहर ने दोनों को जो धक्का दिया तो दोनों टकरा गये।
हुआ यह कि मीर जामिन अली खाना खाकर लेट गये थे। आमेना भी पंखा झेलने के लिए पास ही लेट गयी थी। मत्तो कोठरी में थी। आंगन में लू चल रही थी।
रजिया चुपके से अपने कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर आ गयी। वह दबे पांव बावर्चीखाने की तरफ चली, जहां एक छीके पर हरी-हरी अमियां रखी थी। रजिया के मुँह में पानी आ गया। दो अमियें उतार कर उसने जल्दी-जल्दी कुचला बनाया। और फिर वहीं बैठ कर चटखारे ले-लेकर खाने लगी।
सच्ची बात यह है कि उस समय उसके दिमाग़ में शौकत नहीं था। परन्तु शौकत आ गया। और यह भी सच्ची बात है कि उस समय उसके दिमाग़ में भी रजिया नहीं थी। परन्तु एक छोटे-से घर में एक दूसरे को न देख लेना संभव नहीं हैं। दोनों ने एक दूसरे को देखा-दोनों के हलक एकदम से सूख गये। वह बावर्चीखाने की चौखट पर रुक गया। उसने बोलना चाहा परन्तु आवाज गोंद की तरह सूख गयी थी। तो उसने कुचले के लिए हाथ बढ़ा दिया। रजिया ने उसी उंगली पर थोडा-सा कुचला उठाया जिससे वह खुद अब तक चाट रही थी। कुचले समेत उसने वह उंगली शौकत की खुली हुई हथेली पर रख दी।
''छोटी बहिनी।'' उसके हलक़ से एक अजीब-सी आवाज+ निकली।
''का है।'' रजिया के लिए भी अपनी आवाज को पहचान लेना मुश्किल हो गया।
तो शौकत ने उसकी वह उंगली पकड़ ली। फिर वह उस उंगली को अपने होंठों की तरफ ले चला। अब बात उसकी समझ में आने वाली लगी थी। यह तो फ़िल्मी पर्दे जैसी बात है। उसने वह उंगली चाट ली बैक ग्राउंड म्यूजिक शुरू हो गया। रजिया बावर्चीखाने से दालान की तरफ भागी। मुहम्मद रफी ने गाना शुरू कर दिया। अपने कमरे का दरवाजा बंद करने से पहले रजिया पल भर के लिए ठिठकी। शौकत अब भी वहीं खड़ा था। रजिया मुस्करा दी और शौकत तक लता मंगेशकर की आवाज आने लगी-उसे यकीन हो गया कि वह रजिया से प्यार करने लगा है। यह यकीन दिल हिलानेवाला था। पता नहीं इस फ़िल्म का अंजाम क्या होगा। अभी तो के०एन०सिंह आयेगा। फिर मीर जामिन अली हीरोइन के बापों की तरह मरने की धमकी देंगे। फिर जैसे फ़िल्मों में आता है, समाज आयेगा। शौकत बेचारे ने बहुत सिर मारा परन्तु उसकी समझ में यह न आया कि आख़िर यह समाज क्या होता है।

उस रात शौकत बहुत देर तक जागता रहा और सोचता रहा। फिर वह उठा और सोचता रहा। फिर वह उठा और बाहर की ड्योढ़ी में चला गया और लालटैन की सहमी हुई रोशनी में दिलीप कुमार को खत लिखने लगा। वह कोई पढ़ा लिखा आदमी नहीं था। बड़ी बहिनी ने उसे उल्टा-सीधा पढ़ना और टेढ़ा-सीधा लिखना सिखा दिया था। उसने दिलीप कुमार को एक छोटा-सा खत लिखने में लगभग सारी रात लगा दी। उसने लिखाः
मेरे भाई दिलीप कुमार को बाद अस्सलामालेकुम के मालूम हो कि मैं खैरियत से हूँ और खैरियत उनकी खुदावंदे करीम से नेक चाहता हूँ।
यहाँ तक लिख कर रुक गया। क्योंकि यहां तक की बात उसे जबानी याद थी। यह तो हर खत में लिखा जाता है। परन्तु बात आगे कैसे बढ़े उसने फिर शुरू कियाः
गुजारिश अहवाल यह है कि मुझे छोटी बहिनी से प्यार हो गया। आप छोटी बहिनी को नहीं जानते। मगर खुदा की कसम यह आपकी हीरोइन से कहीं ज्यादा खूबसूरत हैं आप हिन्दू है तो क्या हुआ। बाकी आपके सीने में भी दिल होगा। आप एक प्यार करने वाले की मदद कीजिए। खुदा आपको इसका बदला देगा और आपको के०एन०सिंह के हाथ से बचायेगा। कसम अल्लापाक की जब वह आपको मारता है तो मेरा मगर फिर जाता है और जी चाहता है कि मैं उसकी बोटियां नोच कर चील कौवों की खिला दूं। आप ई मत सोचिए कि मैं मुस्लमान हूँ तो पाकिस्तान चला गया हूंगा और आप कोई पाकिस्तानी की मदद काहे को करें। हम पाकिस्तान ना गये हैं। हम तो बस अपने गांव से निकलकर शहर में आ गये है। और हम यहां बीड़ी बनाते हैं। और साढ़े चार रुपया रोज कमा ले रहें। हमारे लायक कोई काम हो तो जरुर लिखिए। बाक़ी आप बड़े भाई हैं और हर फ़िल्म में कोई न कोई से प्यार जरुर करते हैं। एह मारे ई जरुर बताइए कि अब हम को क्या करना चाहिए। थोड़े लिखे को बहुत जानिए और खत को तार जान कर जवाब दीजिए। एक बात हमारी समझ में नहीं आती कि के०एन०सिंह वगैरह से तो हम समझ ले। बाकी ई समाज का होता है? आज तक कोई फिलिम में एकी शकल ना देखाई दी हैं। काई समाज बहुत तगड़ा होता है।
आपका नाचीज खादिम
शौकत अली

यह बात लिखकर वह थक गया। उसे लगा कि दो हजार बीड़ी बनाना एक खत लिखने के मुकाबले में बहुत आसान काम होता है।
खत को लिफ़ाफे में रखने के बाद वह पता लिखने लगा।
दर शहर बंबई पहुंच कर
आली जनाब भाई दिलीप कुमार, मशहूर हीरो को मिले।
फिर वह थक कर सो गया। दूसरे दिन उसने पहला काम यह किया कि इस खत को लेटर बक्स में डाल आया। उसे पक्का यक़ीन था कि दिलीप कुमार खत का जवाब अवश्य देगा।
अब यह तो नहीं मालूम कि दिलीप कुमार को यह खत मिला या नहीं और यदि मिला तो उन्होंने उसे समाज की क्या परिभाषा दी। परन्तु यह मुझे अवश्य मालूम है कि शौकत-रजिया-पे्रम की कहानी हिन्दी फिल्मों के ढ़र्रों पर नहीं चली। क्योंकि हिन्दी फिल्मों में यह अवश्य दिखला दिया जाता है कि विजय समाज की हुई या नायक की। परन्तु इस कहानी के बारे में यह नहीं कहा जा सकता। दूसरी परेशानी यह है कि हमारे देश में हिन्दू सोशल और मुस्लिम सोशल फिल्में बनाते हैं जैसे कि देश हिन्दू और मुस्लमान समाजों में बंटा हुआ हो और यदि सोसाइटी एक ही है तो कोई मुझे बतलाये कि यह हिन्दू सोशल और मुस्लिम सोशल क्या होता है? मजे की दूसरी बात यह है कि हिन्दू सोशल' फिल्में देखिए तो पता चलेगा कि भारत में केवल हिन्दू रहते है और 'मुस्लिम सोशल' देखिए तो पता चले कि इस देश में मुस्लमानों के सिवा कोई रहता ही नहीं। मुस्लिम सोशल फिल्मों की एक खसूसियत और होती है कि उसका हीरो यदि नवाब नहीं होता तो कवि अवश्य होता है। और अपना शौकत न नवाब था और न कवि। वह नमाज+ पढ़ता था। रोजे रखता था। परन्तु मुस्लिम सोशल फ़िल्मों के गज ;या मीटरद्ध से नापा जाये तो वह मुस्लमान ही नहीं था। इन बातों से अलग रह कर भी देखा जाये तो शौकत किसी कोने से हीरो नहीं दिखाई देता था। बीड़ी बनाने वाला एक बीड़ी मजदूर भला हीरो कैसे हो सकता है। उसे तो जब पता चला कि उसे रजिया से प्रेम हो गया है, तो उसका कलेजा धक से हो गया। उसे यकीन ही नहीं आ रहा था। छोटी बहिनी और शौकत! यह तो कोई बात ही नहीं हुई। परन्तु हुआ यह कि रजिया की माँ आमेना और अपनी माँ मत्तो की आँखें बचा-बचा कर रजिया की तरफ देखने लगा और वह जब भी रजिया की तरफ देखता उसके सारे बदन में जैसे हजारों-हजार दिल धड़कने लगते और इन हजारों हजार दिलों में लाखों लाख चिराग जल जाते और उसकी रग-रग में उजाला हो जाता और छोटे-छोटे अनगिनत ख़वाब हंसते हुए रंगों की गलियों में दौड़ने लगते और वह शोर होता कि कान पड़ी आवाज न सुनायी देती।
कई बार ऐसा हुआ कि उसने अपनी माँ की आवाज न सुनी। माँ का दिल थक से हो गया। इकलौते बेटे यूँ भी बड़े कीमती होते है और जब से पाकिस्तान बना है तब से इकलौते मुस्लमान बेटों का दाम इतना बढ़ गया है कि कभी-कभी ममता दिल में मसोस कर रह जाती है, क्योंकि सौदा नहीं पटता, इसीलिए मत्तो हील खाने लगी। एक दिन वह चुपके से मस्जिद के मुल्ला के पास गई। उसने कहा कि शौकत पर एक परी का साया हो गया है। मुल्ला को मालूम था कि मत्तो मीर जामिन अली की नौकरानी है, और मुल्ला को यह भी मालूम था कि जमींदारी ख़त्म हो चुकी है। इसलिए उसने केवल आधे तोले सोने,एक काले मुर्ग और एक तोले जाफरान की मांग की, यदि वह मत्तो के हाथों में सोने की चार चूड़ियाँ न देख लेता तो शायद सोने की मांग न करता। परन्तु चूड़ियां उसके सामने थी। मत्तो ने एक चूड़ी उसके हवाले की। मुर्ग और केसर का दाम दिया। एक शुक्रवार को मुल्ला ने उसे दो ताबीज दिये। एक ताबीज शौकत के पलंग के पाये के नीचे दबाने के वास्ते और दूसरा घोल कर पिलाने के लिए। मत्तो उस दिन मस्जिद से बहुत खुश लौटी। एक ताबीज उसने पलंग के पाये के नीचे दबा दिया और दूसरा ताबीज उसने शौकत की दाल में घोल दिया। ताबीजों के साथ-साथ उसने हाथ उठा-उठा कर उस परी को खूब कोसने भी दिये जिसने उसके इकलौते बेटे पर अपना साया डाल दिया था।

जाहिर है कि शौकत को ये बातें नहीं मालूम थी। वह तो रजिया के ख़याल में मगन था। पहले वह बाहर की ड्योढ़ी में बैठकर बीड़ी बनाया करता था। अब उसने दालान में अपनी चटाई डाल ली थी।
छोटे दालान से सदर दालान साफ दिखाई देता था। वह बोड़ी बनाता रहता और चुपके-चुपके कोई ग़जल गुनगुनाता रहता।
घर में इस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि अब रजिया ने ऊपरवाले कमरे में समय बिताना छोड़ दिया है।
रजिया जब स्कूल में न होती तो सदर दालान में होती और एक पलंग पर लेटी पांव के अंगूठे हिलाती रहती और इस्मत चुगताई या मंटो या कृष्ण चंदर की कहानियां पढ़ती रहती और कनखियों से बीड़ी बनाते हुए शौकत को देखती रहती। कभी-कभार दोनों की आँखें मिल जाती तो दोनों मुस्करा देते। इस मुस्कराहट की ओस से दोनों के बदन नम हो जाते।
एक दिन मत्तो ने शौकत की मुस्कराहट पकड़ ली। उसने बावर्चीखाने में मसाला पीसते-पीसते उस मुस्कान का पीछा किया। वह मुस्कान रजिया की आँखों से उसके दिल में उतर गयी। मत्तो को अपनी आँखों पर यकीन न आया। यह एक अनहोनी बात थी। यह और वह है कि वह खुद दिल में मीर जामिन अली को पूज चुका थी। परन्तु वह नौकर नहीं थी, नौकरानी थी। नौकरी का पूरा इतिहास नौकरानियों और मालिकों के बदन के टकराव की कहानियों से भरा हुआ था। परन्तु आज तक किसी नौकर से मालिक की लकड़ी की तरफ देखकर मुस्कराने का हौसला नहीं किया था। अनारकली हो तो दीवार में चुनवा दी जाती है। परन्तु अनारकली की जगह कोई शौकत हो तो क्या अंजाम होता है। वह कांप गयी।
उस रात जब घर में सोता पड़ गया तो वह शौकत के सिर में तेल डालने बैठ गयी। वह इस उघेड़-बुन में थी कि बात शुरू कैसे करे कि खुद शौकत ने बात शुरू कर दी।
''अब तू बूढ़ी हो गयी है अम्मा जाओ आराम करो।''
स्त्र्''हां, बेटा बूढ़ी त ज+रूर हो गयी हौं। बाकी तौरे सिर में तेलो पड़ना त जरूरी है ना। ए ही मारे सोच रहें कि तोरा बिआह कर के चांद अय्यसी दुल्हिन लिआये।''
''हम त छोटी बहिनी से बिआह करेंगे।'' शौकत ने कहा। यह बात उसने दस-बारह साल बाद कहीं थी। और अब मत्तो उसे चांटा भी नहीं मार सकती थी। उसे कोसने भी नहीं दे सकती थी।
''अय्यसी बात ना करे को बेटा!''
वह उठ कर बैठ गया।
''काहे न करें अय्यसी बात।''
ऊ मालिक है।''
''का तनखाह देते हैं तो को?''
''तनखाह से का होता है!''
''...हम बदमाशी करें की बात ना कर रहें। बिआह करे की बात कर रहे।''
''बरब्बर की बात ना है ना बेटा। एह मारे बिआहो की बात बदमाशीय की बात है।''
''का हम शम्सूओं मियां से गये गुजरे हैं, तू हम्में इ बता द्यो कि हमरे में का खराबी है?''
उसमें कोर्ई खराबी होती तब भी मत्तो को दिखाई न देती क्योंकि मत्तो माँ थी। तो वह शौकत के इस सवाल का क्या जवाब देती। वह चुपचाप सिर में तेल मलने लगी। परन्तु बैठे हुए शौकत का सिर उसे बहुत ऊँचा लगा।
''अच्छा तनी लेट के जट से तेल त लगवा ले।'' मत्तो की आवाज+ जैसे उसके कान से चिपक गयी। उसकी आवाज इस इश्क की आंच से पिघल गयी थी। वह लेट गया। सन्नाटा छा गया।
''अच्छा जो मैं इ मानों ल्यों कि मियां छोटी बहिनी से तोरा बिआह करे पर राजी हो जय्यहें त तैं हम्में ई बता कि मैं छोटी बहिनी से अपना पांव दबवय्यहो?''
''काहें ना दबावय्यहों?''
हमरें बाप दादा जेके बाप दादा का नमक खाइन हैं हम ओसे अपना पांव ना दबवा सकते।'' मत्तो की आवाज में फैसले की खनक थी।
''अच्छा मत दबवय्यहो बस। हम दबावेंगे तोरा पांव। और अब हम्में सोये द्यो। अब हम्में नींद आ रही।'' उसने करवट ले ली।
थोड़ी देर तक मत्तो उसका सिर सहलाती रही। पर जब शौकत आँखें बंद किये पड़ा ही रहा तो वह उठ कर अपने बिस्तर पर चली गयी।

गर्मी की रात थी। बांस का पंखा झलती हुई मत्तो तारों भरे आसमान की तरफ देखती रही। खटोलना घर की छत पर था। उसकी आँखें उसी खटोलने पर जम गयीं और वह शौकत के बारे में सोचने लगी। का मैं ओको बित्ते भर से एक लाठी का एह मा किये हौं कि ऊ छोटी बहनी के वास्ते मोरी बात टाल दें?
परन्तु यह बात ऐसी थी कि वह मुंह से निकाल भी नहीं सकती थी। कई दिन तक वह यही सोचती रही और बावर्चीखाने के दर पर बैठी अपने शौकत की मुस्कान को छोटी बीबी की आँखों से दिल में उतरते देखती रही और हौल खाती रही कि छोटी बीबी का क्या है। बरस-दो बरस में कोई बाजे-गाजे के साथ आकर उसे बिदा करवा ले जायेगा। परन्तु शौकत का क्या होगा?
मत्तो सोच रही थी।
शौकत मुस्करा रहा था।
रजिया इस्मत की टेढ़ी लकीर पढ़ रही थी।
समय रेंग रहा था।
दोपहर का वक्त था। आंगन में लू दौड़ रही थी। रजिया एक टीकोरा खा रही थी कि शौकत आया। रजिया को देखकर वह बावर्चीखाने में चला गया।
''हमहूं को चखा दीजिए जरा-सा सा।''
रजिया मुस्करा दी। उसने अपना जूठा टिकोरा उसकी तरफ बढ़ा दिया। यही मौका था। शौकत ने हजार बार दिलीप कुमार को कामिनी कौशल, नलिनी जयवंत या मधुबाला का हाथ पकड़ते देखा था। उसने रजिया का हाथ पकड़ लिया।
कोई देख लीहों रजिया की आवाज प्यार के बोझ से लचक गयी।
''दुपहरिया में कौन खड़ा है दखें वाला।''
शौकत ने छोटी बहिनी को अपनी बांहो में कस लिया। और ठीक उसी वक्त नाइन कहीं से हिस्सा लेकर आ गयी। रजिया तड़प कर अलग हो गयी। शौकत मटके से पानी निकालने लगा। नाइन सिर से सेनी उतार कर वहीं बावर्ची खाने में बैठ गयी।
''सेख जी इ आम भे जिन हैं। पहिली फसिल आयी है।'' नाइन ने १२ आम निकाल कर बावर्चीखाने के फ़र्श पर रख दिये। रजिया ने सेनी में कोई आध सेर आटा सिर भारी का डाल दिया। नाइन ने सेनी पर रख ली।
''बड़ी गर्मी है।'' नाइन ने रजिया से कहा।
रजिया ने सिर हिला दिया। नाइन चली गयी।
''अ जो ऊ देख लिहिस होय तब का होगा'' उसने सवाल किया।
''हमरे ख़याल में त ना देखिस है।'' शौकत ने कहा। डर तो उसे भी यही था कि नाइन ने देख लिया होगा तो क्या होगा। परन्तु वह छोटी बहिनी को परेशान करना नहीं चाहता था।
दोनों को शाम होते-होते इस प्रश्न का जवाब मिल गया।
नाइन मीर जामिन अली के घर से उठकर समीउल्ला खां के घर गयी। हिस्सा देकर जमीन पर पलंग की पट्टी से लग कर बैठ कर पान का इंतजार करने लगी। खां साहब की बीवी पान लगा रही थी।
यह बोली।
''बाप रे बाप। का जमाना आ गया है!''
''का भया?''
''अब मैं का बताओं बीबी कलजुग है। जो न हो जाये ऊ थोड़ा है।''
''तनी एक देखे कोई।'' पठानी झल्ला गयी। ''टरटराये जा रही और मुंह से ई ना फूटती कि आख़िर भया का।''
''बाइस्कोप भया। बीबी और का भया!'' नाइन सिनेमा की शौकीन थी। पठानी भी कभी कभार सिनेमा देख आया करती थी। सुन कर उनका माथा ठनका। वह संभल कर बैठ गयीं।
''मैं निखौंदी चली गयी दनदनाती मीर साहब के घर हिस्सा देवे। बाकी अब हुआ पुकार के जाय को चाहिए बीबी।''
नाइन ने यह कहानी सुनाते-सुनाते तीन पान खाये। पठानी इस कहानी को अमृत की चाट गयीं। एक-एक शब्द को उन्होंने खूब-खूब निचोड़ा कि कोई बूंद रह न जाये। नाइन तो कहानी सुना कर चली गयी। परन्तु पठानी के लिए घर में बैठना-मुश्किल हो गया और दिन था कि ढ़लने का नाम नहीं लेता था। वह इस कदर जल्दी में थी कि अस्र की नमाज उन्होंने समय से पढ़ डाली।
पठानी के साथ यह कहानी सारे मुहल्ले में फैल गयीं। बीबियों ने दांतों में उंगलियों दबा ली। पठानी सारे मुहल्ले का चक्कर लगा कर आख़िर में मीर जामिन अली के घर पहुंची। आमेना को तो कुछ मालूम नहीं था। उसने पठानी को हाथों-हाथ लिया। परन्तु पठानी बैठती ही बड़े राजदाराना लहजे में बोली कि मुहल्ले में क्या बातें हो रहीं...
''अब मैं बेचारी केहका केहका मुँह बंद करौ?''
आमेना सन्नााटा में आ गयी। पठानी आमेना को सन्नााटे में छोड़ कर चली गयी। उनके जाने के बाद आमेना ने बावर्चीखाने की तरफ देखा। मत्तो दाल बघार रही थी। फिर उन्होंने छोटे दालान की तरफ देखा। शौकत बैठा लालटैन की रोशनी में बीड़ी बना रहा था। फिर उन्होंने सदर दालान की तरफ देखा। सड़ी हुई गर्मी में रजिया एक पलंग पर लेटी न जाने क्या पढ़ रही थी और पैर के अंगूठे नचा रही थी। आमेना के तन बदन में आग लग गयी। वह उठी सदर दालान में जाकर उन्होंने रजिया को एक दोथप्पड़ मारा और फिर वह उसे कोसने लगी।
उनके कोसने इतने साफ थे कि बात मत्तो, शौकत और रजिया की समझ में आ गयी। आमेना रोती जा रही थी और बेटी के मरने की दुआएं मांगती जा रही थी और नमक हरामों को शाप देती जा रही थी।
पोर-पोर गल के गिर जाये नमक हरामन की। मरते वक्त कोई मुँह में पानी चुआवेवाला ना जुड़े। या अल्लाह माटी मिला वे निशान उठ जावे। कबुर पर दिया बत्ती करनेवाला ना रह जाये...''
अपनी झल्लाहट में वह यह भी भूल गयी कि यह मीर साहब के खाने का वक्त हैं। मीर साहब यह कोसने सुन कर सन्नाटे में आ गये।
''क्या हो गया भई।''
'' अरे इ पुछिए कि का ना हो गया। बता अपने बाप को ही कलमूंही।''
कलमूंही! यह शब्द एक पत्थर की तरह मीर साहब के माथे पर लगा। उनकी आत्मा लहू लहान हो गयी। वह किसी छतनार बूढ़े पेड़ की तरह इस आंधी में टूट गयी...
''इस मत्तो हलामजादी से कहो कि अपने नमक हराम बेटे को ले कर इसी वक्त जाये मेरे घर से।''
आमेना आंसू पोंछती हुई पांयती बैठ गयी। रजिया वहीं दालान में थी और रो नहीं रही थी। शौकत अपने दालान में था। परन्तु उसने बीड़ी का सूप नीचे रख दिया था। मत्तो बावर्चीखाने में थी। वह मीर साहब के लिए खाना निकाल रही थी। मीर साहब का हुक्म सुनते ही वह कफगीर को पतीली में छोड़ कर शौकत के पास गयी। अपनी जूती उतार कर उसने शौकत को मारना शुरू किया। शौकत चुपचाप मार खाता रहा। उसने बचने की भी कोई कोशिश न की।
''बाकी जो एह सभन को निकाल दिया गया त महल्लेवाले ई जरूर कहिएं कि जो कउनो बात ना होती त आप एह तरे से इन सभन को कभई ना निकालते।''
आमेना ने कहा।
यह बात भी ठीक थी।
मीर साहब ने अपना फैसला बदल दिया परन्तु यह हुक्म हो गया कि अब शौकत अंदर नहीं आयेगा। शौकत बीड़ी का सूप उठाये, सिर झुकाये बाहर ड्योढ़ी में चला गया।
दूसरे ही दिन में मुहल्ले में खुसुर-फुसुर होने लगी।
''अरे साहब निकाल कैसे दें। चार साढ़े चार रुपया रोज कमा रहा है। लड़का।''
''और हर्ज ही क्या है। इस्लाम ऊंच-नीच तो मानता नही।''
''मैं तो कह रह्मूं भाउज कि इ तो बैगतीं की हद हो गयी। ऊ साफ फंसी है। ओसे!''
शौकत सांप के मुंह की छछूंदर बन गया था। न उगला जा रहा था न निगला जा रहा था। मीर साहब ने बाहर निकालना छोड़ दिया। क्योंकि वह बाहर निकलते तो लोग गला साफ करने लगते।
और घर के अंदर एक गंभीर सन्नाटा था। आमेना बुत बनी एक पलंग पर बैठी रहती। रजिया उसी पलंग पर लेटी कोई किताब पढ़ती रहती। मत्तो खाना पकाती रहती, झाड़-पोंछ करती रहती और रोती रहती। शौकत ड्योढ़ी में बैठा बीड़ी बनाता रहता। मीर साहब हुक्का पीते रहते और अपनी छोटी-छोटी मूंछो को दांतो से चबाते रहते। कोई किसी से नहीं बोलता था। ऐसा लगता था कि घर खाली हो गया है और घर को खाली देख कर कुछ परछाइयां आ बसी हैं।
जमींदारी के खात्मे ने मीर साहब को परेशान किया था। किया था परन्तु बूढ़ा नहीं किया था। मगर रजिया के इश्क़ की गर्म हवा ने उन्हें बिल्कुल झुलस दिया था। वह आत्महत्या भी नहीं कर सकते थे क्योंकि इसका मतलब भी यही निकलता कि उनकी छोटी बेटी उनकी नौकरानी के लड़के से फंसी हुई है। चारा केवल एक था कि जल्द से जल्द रजिया का ब्याह कर दिया जाये-परन्तु अब प्रश्न यह था कि लड़की वाले खुद अपनी बेटी के लिए कहीं पैगाम कैसे दें। मीर साहब ने यह काम करने से नकार कर दिया।
''मार गैरते देखाये को है त ऊहे माटी मिले शौकतवे से दू बोल पढ़वा दिजिए। लड़की वाले बने का मुंहो रह गया है हम लोगन का!''
मीर साहब बल खा कर रह गये। परन्तु बात आमेना ठीक कह रही थी। तो रिश्ते के किसी भाई भतीजे को लिखा गया कि फलां साहब के लड़के से रजिया की बात चलाओ। चक्कर चल गया।
अब ऐसा तो है नहीं कि सारे ही मुस्लमान लड़के पाकिस्तान चल गये हों, कई जगह से खतों का चक्कर चला। एक जगह बात पक्की हो गयी। लड़का पी०डब्ल्यू०डी० में ओवरसियर था। तनखाह तो कुछ ज्यादा न थी। परन्तु ऊपर की आमदनी अल्लाह के करम से काफी थी। लड़के के खानदान में कहीं-कहीं इक्का दुक्का पैबंद लगे हुए थे। परन्तु पाकिस्तान बनवाने की इतनी कीमत तो देनी ही पड़ेगी कि खानदानी लड़कियां खोटे खानदानों में ब्याही जायें। तो साहब मरता क्या न करता। बड़ी ऊंची नाकवाले मीर जामिन अली ने यह रिश्ता मान लिया। बड़े धूम-धड़क्के से तैयारियां शुरू हुई। परन्तु बरात आने के दिन से कोई दो महीने पहले ओवरसियर के बाप का खत आया कि लड़की में खोट है। यह बात इशारे में कहीं गयी थी। साफ साफ यह लिखा गया था कि लड़का ठना हुआ है कि जो दहेज में एक हिंदुस्तान गाड़ी न मिली तो ब्याह करने से फायदा ही क्या। फायदा-यह शब्द भी किन-किन दीवारों पर ठुंका दिखाई देता हैं।
मीर साहब कोई पागल नहीं थे कि इस खत का मतलब न समझ लेते। मतलब साफ था कि लड़की शौकत से फंसी हुई है। उसका ब्याह करना हो तो एक मोटर दो! इसीलिए यह खत पढ़ कर मीर साहब की आंखों में खून उतर आया और आमेना हाथ उठा-उठा कर मुहल्ले वालों को कोसने लगी। ''हे पाक परवर दिगार। जय्यसा इ लोग हमरी बेटी के वास्ते कर रहें इनहूं लोगन के सामने आवे...''
परन्तु कोसनों से क्या होता हैं। रिश्ता टूट गया क्योंकि मीर साहब में कार देने की सकत न थी। उधर सारे मुहल्लेवालों को मालूम था कि बात पक्की हो गयी है और तारीख पड़ गयी है। और यदि उसी तारीख पर बरात न आयी तो मर जाने के सिवा कोई चारा न रह जायेगा।
लड़के के लिए फिर जाल डाला जाने लगा। जो लड़का मिला वह बासठ साल का एक टांठा बुड़ढा था। रिटायर्ड थानेदार था। रंडुवा था। पांच बेटियों और चार बेटों को ब्याह चुका था। परन्तु पांचों दामाद और चारों बेटे पाकिस्तान में थे। इसलिए वह अपनी बूढ़ी तनहाई दूर करने के लिए एक नौजवान लड़की से ब्याह करने को तैयार हो गया।
इस बार मुहल्लेवालों को कानों-कान खबर न होने दी गयी। मत्तो मस्जिद के मुल्ला के पास गयी कि वह कोई ऐसी तरकीब करें कि यह ब्याह हो जाये। मत्तो की समस्या यह थी कि वह यह नहीं भूल सकती थी कि उसकी रगों में दौड़नेवाला लहू वास्तव में रजिया के बाप दादा का नमक है। वह रजिया से पांव दबाने के लिए नहीं कह सकती थी। मुल्ला से भी वह यही रोयी-गायी, क्योंकि दाई से पेट और मुल्ला से बात नहीं छिपायी जाती। सोने की दो चूड़ियों पर बात पक्की हो गयी। मुल्ला ने एक जलाली तावीज लिख दिया और एक जलाली चिल्ला खींचने का वादा किया और वह मत्तो को यह यकीन दिलाने में सफल हो गया कि मीर निजाकत हुसैन बरात ले कर अवश्य आयेंगे। मीर निजाकत हुसैन उस लड़के का नाम था जिससे रजिया की निस्बत लगी थी।
मीर साहब के घर में तो शादी की तैयारियां पहले ही हो चुकी थी। इसलिए उन मियां बीबी का तो केवल यह काम रह गया था कि हर नमाज में यह दुआ मांगें कि ब्याह साथ खैरियत के हो जाये। समधियाने से कोई खत आता तो घड़कते हुए दिल के साथ पढ़ा जाता। और मत्तो आमेना के चेहरे पर इतमिनान की चमक देखकर मुतमइन हो जाती। हर बार मत्तो खुदा का शुक्र अदा करती पर एक दिन जब वह फिर दाल की बघार रही थी। उसने आमेना के कोसनों की आवाज सुनी। हे पाक परवरदिगार। जय्यसा ई लोग हमरी बेटी के वास्ते कर रहें इनहूं लोगन के सामने आवे...
मत्तो के हाथ से बघार का कर्छुल गिर गया। मीर निजाकत हुसैन ने बरात लाने से इनकार नहीं किया था। परन्तु उन्हें चूंकि रजिया और शौकत की कहानी मालूम हो चुकी थी। इसलिए वह रजिया की एक तस्वीर मांग रहे थे।
मीर जामिन अली गुस्से में कांपने लगे। मीर निजाकत हुसैन ने यह नहीं लिखा था कि वह रजिया और शौकत को कहानी सुन चुके परन्तु यूं ऐन वक्+त पर तस्वीर मांगने का और मतलब हो क्या ही सकता है? मीर जामिन अली ने निजाकत हुसैन साहब रिटायर्ड थानेदार को लिखा दिया कि आखिर वह भी पांच बेटियां ब्याह चुके हैं। क्या उन्होंने समधियाने वालों की बेटी की तस्वीरें सप्लाई की थी? इस खत के जवाब में मीर निजाकत हुसैन रिटायर्ड थानेदार ने एक बड़ा सादा-सा खत लिखा। उस खत में सलाम दुआ के बाद लिखा थाः
...खादिम ने अपने समधियानेवालों को बेटियों की तस्वीरें इसलिए नहीं भेजी थी कि उनमें से किसी ने घर के किसी पालक से फंसने की ग़ल्ती नहीं की थी। आपको इत्तला के लिए कुछ खत रवाना कर रहा हूं...
इस खत के साथ चार खत और थे। उनमें से हर खत में रजिया और शौकत की कहानी लिखी थी। वह चारों खत रजिया की तहरीर में थे।
मीर जामिन अली पहली बार यह भूल गये कि हर एक शरीफ आदमी हैं। पहली बार उन्होंने रजिया पर हाथ उठाया। वह उसे केवल मार रहे थे। चूंकि उन्होंने रजिया से बोलना छोड़ रक्खा था इसलिए वह उसे डांट रहे थे। रजिया ने भी चूंकि उनसे बोलना छोड़ रक्खा था इसलिए वह यह भी बताना नहीं चाहती थी कि उसे चोट लग रही है! मीर साहब मारते-मारते थक गये। और तब उन्होंने बेटी की तस्वीर खिंचवाने की बेगैरती करने का फैसला किया।
परन्तु बेटी की तस्वीर खिंचवाना कोई आसान काम नहीं है। वह रजिया को लेकर फ़ोटोग्राफर की दूकान तक जा नहीं सकते थे। घर में फोटोग्र्राफर को बुलाते तब भी वही बात होती। इसलिए एक रिश्तेदार की बीमारी की खबर उड़ा कर मीर साहब बीबी और बेटी को ले कर बनारस चले गये। वहां तस्वीर खिंची और वहीं से मीर निजाकत हुसैन के पास भेज दी गयी। मीर निजाकत हुसैन रजिया पर लहलोट हो गये। वह चार दिन पहले बरात लाने पर तैयार थे। उनका यह जवाब पाकर मीर जामिन अली ने इतमिनान का सांस लिया। मत्तो लपकी लपकी मस्जिद गयी और सवा रुपया मुल्ला को भेंट कर आयी।
मीरासनें ढोल ठोकने लगी।
जिन दिन ढोल ठोंका गया उस रात को सब के सो जाने के बाद रजिया पलंग से उठी। चुपके-चुपके चोरों की तरह वह बाहरी ड्योढ़ी तक चली गयी।
शौकत जाग रहा था।
''अब तोरा का इरादा है शौकत?''
''तूं जो कहो छोटी बहिनी।''
छोटी बहिनी ने कुछ नहीं कहा। सदर दरवाजा खोल कर छोटी बहिनी सड़क पर निकल गयी। अंधेरी रात ने उसे गले लगा लिया। ड्योढ़ी में शौकत के चेहरे पर लालटैन की रोशनी पड़ रही थी। उसने पहले उस दरवाजे की तरफ देखा जिसे खोल कर रजिया ड्योढ़ी में आयी थी। फिर उसने उस दरवाजे की तरफ देखा जिसे खोल कर रजिया सड़क पर निकल गयी थी। और फिर उसने उस परछाई की तरफ देखा जो सड़क पर खड़ी उसकी राह देख रही थी।
वह भी परछाई बन गया।




Monday, April 6, 2009

एक जंग हुई थी कर्बला में

- राही मासूम रजा


जैनब की आँखों में रास्ते की धूल थी, उसने अंगुलियों से आँखें मलीं ... हां, सामने मदीना ही था। नाना मुहम्मद का मदीना। जैनब की आँखें भर आयीं, लेकिन रोना किसलिए ?
बग़ल वाले महमिल का पर्दा उठाये कुलसूम का मर्सिया झांक रहा था :
ऐ नाना के मदीने,
हमें स्वीकार न कर
हमें स्वीकार न कर क्योंकि हम गये थे तो गोदें भरी थीं
और लौटे हैं तो गोदें वीरान हैं ......
एक तरफ़ से मदीना आ रहा था। दूसरी तरफ़ से जैनब का कारवां बढ़ रहा था ... और यादों का दर्द बढ़ता जा रहा था। वह कुछ कैसे बता पायेगी ? उसकी आँखों में आँसुओं की न जाने कितनी नदियां सूख चुकी थीं, उसे ऐसा लगा, जैसे सामने मदीना नहीं है, बल्कि माँ खड़ी है - बाहें, फैलाये। आँसू जैनब के गले में उतर आये- माँ, हम हुसैन को खो आये!
हुसैन। इस नाम में न जाने क्या था कि ज+बान पर आते ही घुल गया और अमृत बन कर रंगों में दौड़ने लगा और बाहों पर पड़े रस्सियों के निशान मिट गये और जैनब को ऐसा लगा, जैसे सब साथ है जैसे अब्बास और अली अकबर अब सवारियों के उतारने का बंदोबस्त करने आने ही वाले हैं। जैसे वह हुसैन की आवाज सुनने ही वाली है-बहन, उतरो, मदीना आ गया।
जैनब को वह रात अच्छी तरह याद थी जब मदीना के गवर्नर वलीद इब्ने-अकबा ने हुसैन को अपने घर बुलाया था, हुसैन तैयार हुए तो फातमी जवान भी तलवारें ले कर उठ खड़े हुए क्योंकि सब जानते थे कि वलीद ने हुसैन को क्यों बुलवाया है। वलीद के पास दमिश्क से यह फरमान आया हुआ था कि हुसैन से कहो कि सिर छुका दें और अगर वह सिर न झुकायें तो सिर काट लिया जाये। वलीद को मालूम था कि जिसे फ़ातिमा ने चक्की पीस-पीस कर पाला है और यहूदियों के बाग़ में पानी चलाकर जिसे अली ने सिर बुलंद करने का सबक़ दिया है, वह सिर नहीं झुकायेगा। यही हुआ। हुसैन उससे यह कह कर चले आये कि हुसैन कोई काम रात के अंधेरे में चुपचाप नहीं करता। सुबह को जवाब दिया जायेगा। परन्तु सुबह होने से पहले हुसैन ने मदीना छोड़ दिया।
जैनब अपने दो बेटों को लेकर भाई के साथ चली, बड़ा बेटा औन ११ साल का था और छोटा बेटा मुहम्मद १० साल का। अब्दुल्ला ने दोनों बेटों को जैनब के हवाले करके कहा था- जैनब, मैं बीमार न होता तो खुद चलता। कोई बुरा समय आ जाये तो मेरी ओर से इन लड़कों को हुसैन पर न्यौछावर कर देना।
यात्रा शुरू हुई। नीचे रेत थी, ऊपर आसमान और वहीं चमचमाता हुआ सूरज बच्चे पानी मांग रहे थे। हुसैन का घोड़ा पानी माँग रहा था और अरब के मशहूर सूरमा हुर की सेना कूफे के गवर्नर इब्ने ज्याद के हुक्म से हुसैन को घेरने के लिए आ पहुंची थी वह सेना परछाई की तरह कर्बला तक हुसैन के साथ आयी।
फुरात का पानी देख कर हुसैन ने घोड़े की लगाम खींच ली, जवानों ने अंगों के बाँध खोल दिये, बच्चे किलकारियां भर कर उछल पडे.... नहर चल रही थी। कारवां रुक गया था।
फिर ताबड़तोड़ फ़ौजें आने लगीं : सेनाध्यक्ष अमर इब्ने साद ने हुक्म दिया कि नहर के किनारे शाही सेना का पड़ाव पड़ेगा। हुसैन ने सौतेले भाई अब्बास से कहा- मैं चाहता हूं कि शाही इतिहासकार को हमारी मौत से जोड़ने के लिए कोई बात न मिले। मैं यह चाहता हूं कि वह केवल यह लिख पाये कि शाही फ़ौजों ने मुहम्मद की औलाद को क़त्ल कर दिया। अब्बास चुप हो गया। ख़ेमें उखाड़े गये और उन्हें ठंडे पानी से बहुत दूर दहकती हुई रेत में गाड़ दिया गया। हुसैन ने यही कहा था- मैं पानी के लिए लड़ना नहीं चाहता। मैंने सर झुकाने से इनकार किया। सिर न झुकाना मनुष्य का अधिकार है। मैं केवल इस अधिकार के लिए लड़ना चाहता हूँ।
हर तरफ एक ही आवाज थी- पानी! पानी! और हुसैन के कंधे जिम्मेदारी के बोझ से दुखने लगे थे।
रात को फैसला कर लिया गया कि सुबह ही लड़ाई होगी।
सबेरा हुआ। जैनब ने औन और मुहम्मद की कमर से तलवारें बांध दीं और कहा-मामू के साथ सुबह की नमाज पढ़ो। हुसैन ने नमाज पढ़वायी।
सामने यजीद की सेना थी। पीछे खेमों में औरतें और बच्चे थे। डेढ़ सौ सिपाही दस हजार सिपाहियों के सामने सीना ताने खड़े थे। डेढ़ सौ सिपाहियों में सबसे छोटा सिपाही १० वर्ष का मुहम्मद था और सबसे बड़ा अड़सठ वर्ष का हुसैन।
यकायक शाही फ़ौज में एक शोर हुआ। जैनब जो द्वार पर खड़ी भाई की तरफ़ देख रही थी, चौंक उठी सामने से चार सवार चले आ रहे थे। जैनब ने हुर को पहचान लिया।
और फिर जो कुछ हुआ उसे जैनब भूल जाना चाहती थी। उसने औन और मुहम्मद को घायल हो कर गिरते देखा, उसने अली अकबर को बरछी खाते देखा। उसने अब्बास की बांहे कटते देखीं। उसने १० वर्ष के क़ासिम की लाश को घोड़ों के सुमों में आते देखा। उसने देखा कि हबीब अपनी भवों को ऊपर उठाकर रूमाल से बांध रहे हैं। उसने मुस्लिम इब्ने औसजा को तीरों से छलनी होते देखा। उसने आसमान की तरफ देखा। आसमान में सूरज अकेला था और कर्बला में हुसैन।
हुसैन कभी दिखायी देते, कभी डूब जाते। जैनब चाहती थी कि सब कुछ अपनी आँखों से देखें। सामने एक टीला था। वह टीले पर जा चढ़ी ... तीसरे पहर की नमाज का समय आ गया था, हुसैन घोड़े से उतर पड़े। जैनब ने उनका सिर सिजदे में झुकते देखा। फिर भीड़ इतनी बढ़ गयी कि टीला नीचा हो गया। जैनब कुछ न देख सकी और फिर भीड़ में एक नेजा उठा। उस पर हुसैन का सिर ... कितना ऊंचा!
... कुलसूम अपना मरसिया गुनगुना रही थी :
- नाना के मदीने
- हमे स्वीकार न कर ....

Sunday, April 5, 2009

एम.एल.ए. साहब

- राही मासूम रजा


एम.एल.ए. साहब के बारे में जानने की सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह एम.एल.ए. नहीं थे। जो वह एम.एल.ए. रहे होते तो उनकी तरफ़ मेरा ध्यान ही न गया होता क्योंकि आज एम.एल.ए. होने में क्या बड़ाई है। हर सातवां-आठवां आदमी या तो एम.एल.ए. है या होना चाहता है। क्योंकि कोयले की इस दलाली में मुंह तो जरूर काला होता है पर मुट्ठी गर्म रहती है तो आज मुंह की क्या हैसियत। असल चीज तो मुट्ठी है और एक आसानी यह भी है कि यह काले लोगों का तो देश ही है, फिर मुंह की कालिख दिखाई किसे देगी, इसलिए ज्+यादातर लोग एम.एल.ए. या एम.एल.ए. के रिश्तेदार बनने की फ़िक्र में दुबले या मोटे होते रहते हैं। कहने का मतलब यह है कि एम.एल.ए. होने या न हो पाने में कोई नयापन नहीं रह गया है। आपको हर मुहल्ले में दो-चार एम.एल.ए. या एक्स एम.एल.ए. या एम.एल.ए. होते-होते रह जाने वाले मिल जायेंगे। तो फिर ऐसों की कहानी सुनाने में क्या मजा? और ऐसों की कहानी ही क्या इसीलिए एम.एल.ए. साहब में मेरी दिलचस्पी तब बढ़ी जब मुझे यह मालूम हुआ कि वह एम.एल.ए. हैं ही नहीं।
चुनाव के दिन थे। हर तरफ़ बड़ी चहल-पहल थी। लोग अपने-अपने कारोबार छोड़कर चंद दिनों के लिए नेता बने ठस्से से तक़रीरें करते घूम रहे थे।
कड़कड़ाते जाड़ों की रात थी। मैं सिनेमा देख कर लौट रहा था कि कान में आवाज आयी और अब मैं एम.एल.ए. साहब से दरख्वास्त करता हूं कि वह माइक पर तशरीफ लायें और अपने ख़यालात से आप लोगों को फायदा उठाने का मौक़ा दें।
सामने वाली गली में दरी का फ़र्श लगा हुआ था। सामने कुछ बच्चे रूमाल के चूहे दौड़ा रहे थे। उनके पीछे बूढ़े चुनाव लड़ने वाले की चाय पी कर उसका विरोध करने वाले की बात कर रहे थे।
कि एक आदमी, दुबला-पतला, रुवा खड़ा, सांवले रंग वाला सफ़ेद शेरवानी वाला माइक पर आया। गला साफ करने के बाद बोला - तक़रीरें तो आजकल आप लोग दिन-रात सुन रहे होंगे। मैं तो सरकार से कहने वाला हूं कि चुनाव में खार्च पर रोक-टोक करने का उसे कोई हक़ नहीं है। साहब यह बाबू द्वारका प्रसाद अपने चुनाव में सरकारी पैसा तो फूंक नहीं रहे हैं कि सरकार के पेट में दर्द हो रहा है। पर तक़रीर राशन कार्ड पर मिलनी चाहिए। जो एक वोटर को दो से ज्यादा तकरीरें चटाये, उस पर मुक़दमा चलाना चाहिए और उसकी जमानत जब्त कर लेनी चाहिए।
यह आवाज+ मेरी साइकिल का पीछा कर रही थी। मैं पलट आया।
एम.एल.ए. साहब बड़े मजे में बोल रहे थे - तो साहब मैं तक़रीर नहीं करूंगा। मैं तो तीन सौ मील का सफर करके और दो रातें आंखों में काट के आपके पास सिर्फ़ यह कहने आया हूं कि कांग्रेस को वोट देने से क्या फ़ायदा? अब तक क्या फ़ायदा हुआ जो अब कोई फायदा होगा। जनसंघ और मुस्लिम लीग और इस तरह की दूसरी पार्टियां तो न किसी गिनती में, न शुमार में, नफ़रत के इन ताजिरों से हमें या आपको क्या लेना-देना? अब आइये, लाल झंडे वालों को लीजिए। तो साहब, लाल झंडा तो सौ फ़ीसदी बिदेसी हैं... वह रुके। भीड़ को घूरा, चेहरा जरा सख्त पड़ा और फिर कड़कदार आवाज में बोले - अगर यह सच है कि हिंदुस्तान आजाद हो गया है तो आपके वोटों का हक़दार सिर्फ़ कोई आजाद उम्मीदवार ही हो सकता है और बाबू द्वारका प्रसाद से ज्यादा आजाद तो कोई दूसरा उम्मीदवार है नहीं...
बाबूजी के लोगों ने तालियां बजायीं।
एम.एल.ए. साहब मुसकराये बोले - तो मैं यह अर्ज कर रहा था कि मैं कोई तक़रीर नहीं करूंगा। हां, आप लोगों में से कोई साहब कोई सवाल करना चाहें, तो मैं हाजिर हूं।
कोई साहब नहीं बोले।
एम.एल.ए. साहब ने कहा - कोई बात नहीं। मैं खुद ही आपकी तरफ़ से सवाल भी करूंगा और जवाब भी दूंगा। आप कह सकते हैं कि बाबूजी को वोट देने से क्या फ़ायदा, वह कर ही क्या सकते हैं? बिलकुल सही सवाल है... आपका, और मैं इस सवाल का सीधा जवाब देता हूं। बाबू जी एम.एल.ए. हो जाने के बाद आपके लिए कुछ नहीं करेंगे। पर जब मैं पूछता हूं कि अब से पहले आप जिन लोगों को यहां से एम.एल.ए. बना चुके, उन लोगों ने आपके लिए क्या किया? कितने तीर मारे? कितने मैदान जीते? तो फिर आप बाबूजी ही से यह सवाल क्यों करें? अब तक तो आप लोगों को इसका आदी हो जाना चाहिए था कि जिसे वोट दिया जाता है, वह आपके लिए कुछ करता-वरता नहीं। पर बाबूजी और दूसरों में एक फ़र्क जरूर है। यह दूसरों की तरह आपसे झूठे वादे नहीं कर रहे हैं। यह एलेक्शन मेनिफेस्टो तो नहीं बंटवाते और सबसे बड़ी बात यह है कि इनका पेट कई पुश्तों से भरा हुआ है। आप अगर फ़िर किसी भुक्खड़ को बावरचीख़ाने का दारोग़ा बनाना चाहें तो आपकी मरजी। मगर पांच बरस फिर फ़ाक़े ही करने पड़ें तो यह मत कहियेगा कि भैया बात तो एम.एल.ए. साहब सोलह आने पाव रत्ती खरी कह गये थे।
वह रुक गये क्योंकि एक नौजवान की गांधी टोपी बीच में खड़ी हो गयी थी।
एम.एल.ए. साहब मुस्कराकर बोले - कहिए मियां? टोपी ने कहा - सरकार ने हमारे लिए बहुत कुछ किया है साहब...
एम.एल.ए. साहब ने टोक दिया - बहुत कुछ किया है। गेहूं तीन सेर से ढाई सेर का कर दिया गया है ताकि लोगों को भूखे मरने में आसानी हो। क्या बात करते हो साहबजादे। अरे इस सरकार ने तो मरने तक पर टैक्स लगा दिया है। कहां रहते हो तुम, क्या किया है सरकार ने। कभी सेर भर चावल उधार दिया है उसने आपको? टैक्स में कभी मोल-तोल किया है आपने। सरकार है कि बाटा की दुकान? एक रेट बांध दिया है। जिंदगी नक़ली मिलेगी पर दाम ऐसी जिंदगी का वसूलेगी जैसे यह जिंदगी आर्डर भेज कर ख़ास आप लोगों के लिए ऊपर से मंगवायी गयी है। क्या किया है सरकार ने जरा मैं भी तो सुनूं?
बिचारी कमसिन टोपी घबरा गयी। भरे मजमें में चोरों की तरह खड़ी रह गयी। थूक घोंटकर बोली - सरकार ने क्या पन-बिजली द्वारा...
टोपी टोक दी गयी - एक मिनट मियां। आपने अच्छा याद दिलाया। पन-बिजली की बात तो मैं भूल ही गया था। सरकार ने पानी से बिजली तो जरूर निकाली है मियां पर दोस्तो, इसे कहते हैं चोरी और उस पर सीनाजोरी। असली घी अब दवा के लिए नहीं मिलता। असली मक्खन किसी को लगाने तक के लिए नहीं मिलता और यह श्रीड्डष्ण का देश कहा जाता है। चावल में इतना कंकर होता है कि कभी-कभी यह ख्याल होता है कि चावल में कंकर नहीं बल्कि कंकर में चावल मिला हुआ है। एक पानी बचा था जिसे पीकर लोग जीते थे तो सरकार ने उस पानी की बिजली निकाल ली। अरे बिजली ही निकल गयी तो पानी में रहा क्या? यह हिजड़ा पानी पीकर नयी नस्ल का क्या हाल होगा साहब? और सितम जरीफ़ी यह कि पानी की बिजली निकाल ली और वाटर टैक्स बढ़ा दिया। आप पूछते हैं कि बाबूजी एम.एल.ए. होने के बाद क्या करेंगे? बाबूजी कोशिश करेंगे कि पानी की निकली हुई बिजली पानी में वापस मिला दी जाये...
इस बार बाबूजी के आदमियों को ताली नहीं बजानी पड़ी। सामने बैठे हुए बच्चे तो कब के सो चुके थे, पर यह बात बड़े बूढ़ों की समझ में आ गयी।
बिचारी कमसिन गांधी टोपी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था।
दूसरे दिन शहर के राजनीतिक वातावरण में हलचल मच गयी। किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि बेपढ़े लोगों को कैसे समझाया जाये कि पानी हिजड़ा नहीं हुआ। और दूसरे ही दिन एम.एल.ए. साहब के इशारे पर बाबूजी ने तुरुप का एक्का चल दिया। लाउडस्पीकर पर एलान किया गया कि बाबूजी खास अपने खर्च पर शहर में एक सौ पचास कुएं खुदवायेंगे और दो सौ कुओं की सफाई करवायेंगे।
सारी राजनीति धरी रह गयी। एलेक्शन मेनिफ़ेस्टो रद्दी बाजार में आ गये। अखिल भारतीय नेताओं ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया पर पानी का हिजड़ापन न गया और बाबू द्वारका प्रसाद चुनाव जीत गये।
मैं तो उसी रात वाली मीटिंग में एम.एल.ए. साहब का क़ायल हो गया था। पर फिर बात आयी गयी हो गयी। हां, जब चुनाव के दिन आते तो मुझे एम.एल.ए. साहब की याद जरूर आती और मैं सोचने लगता कि आजकल वह किसका चुनाव लड़ा रहे होंगे। बात कभी इससे आगे नहीं बढ़ी कि एक दिन फिर उनकी भनक मिली।
चुनाव ही के दिन थे। कम्युनिस्ट पार्टी के एक दोस्त ने अपनी तरफ़ से एक लतीफा सुनाया।
बोला-एम.एल.ए. साहब ने तो नाक में दम कर दिया है, यार। क्या-क्या तरकीबें सूझती हैं उन्हें अब वह कांगरेसी हो गये हैं। एक बीहड़ इलाक़े में कैन्वेसिंग करने गये। उस कांस्टिटुएंसी में हम लोग चार साल से काम कर रहे हैं और यकीन था कि इस चुनाव में हम ही जीतेंगे कि बिटिया रानी ने एम.एल.ए. साहब बुक कर दिया और साहब उस आदमी ने एक घंटे में हमारी चार साल की मेहनत पर पानी फेर दिया।
मैं हंस पड़ा - हुआ क्या?
वह बोला - हुआ वह जो कोई सोच भी नहीं सकता था। हम लोगों ने सारा जोर इस पर लगाया था कि उस क्षेत्र में एम.एल.ए. ने ट्यूबवेल लगवाने का वादा किया था। जाहिर है कि वादा पूरा नहीं हुआ तो हम लोगों ने तय किया कि चुनाव की हर मीटिंग में यही एक सवाल उठाया जाये। पर एम.एल.ए. साहब ने पैदली मात दे दी और अब इस चुनाव में तो हम लोग वहां से जीत नहीं सकते। क्या सूझती है कमबख्त को!
कहते हैं कि खड़ी दोपहर में किसानों के एक परिवार ने देखा कि एम.एल.ए. साहब साइकिल चलाते चले आ रहे हैं। साइकिल के कैरियर पर मज+बूत रस्सी से एक बक्स बंधा हुआ है।
बूढ़ा किसान बोला - लगि रहा कि ओट की फसिल आय गयी तनी पानी खींच लिया रे।
छह-सात साल का एक लड़का रस्सी-डोल ले कर कच्चे कुएं की तरफ़ लपक गया। इतने में साइकिल पास आ गयी। किसान खड़े हो गये।
बूढ़े किसान ने सलाम किया-सलाम एमएल्ले साब।
वह साइकिल से उतरते हुए बोले-सलाम भाई, सलाम। क्या हाल चाल हैं?
नौजवान किसान बोला - अहाल चाल कैयसा साब खाये को केत मिलत ना बा। हाल चाल कहां से होई...
एम.एल.ए. साहब इस बात को साफ टाल गये। वह तीन-साल के उस बच्चे के सर पर प्यार से हाथ फेरने लगे, जो उनकी तरफ़ ग़ौर से देख रहा था। बोले-अरे, यह तो जरा नहीं बढ़ा।
नौजवान किसान खड़ी बोली में बोला - इ वह लड़का नहीं है जेको आप पांच बरस पहिले देख गये रहे। वह तो आप ख़ातिर कुंए से पानी खींच रहा है। चुनाव में एही तो लंबरी खराबी है कि पांच बरिस के बाद होता है। भेंट-मुलाकात का चानस नहीं भिड़ता।
अधेड़ उम्र वाला बोला - भैया त आपको देखते ही ताड़ गये रहे कि होय न होय चुनाव का जमाना आगइल बाय नहीं त भला आपका दरसन होत इ खड़ी दुपहरिया मां!
एम.एल.ए. साहब मुसकराते रहे। उनकी मुसकराहट में एक शिकन तक नहीं पड़ी। बोले - कह लो भई, कह लो। तुम लोग नहीं कहोगे तो क्या कहने वाले किराये पर बुलाये जायेंगे रूस या चीन से तुम लोग यह सोचते हों ना कि एम.एल.ए. साहब पांच बरस के बाद आते हैं और वह भी वोट मांगने पर भई राम अवतार, हम तो हैं खल्क के ख़ादिम - क्या कहते हैं, हां, जनता के सेवक और जनता खाली इस गांव के आस पास तो रहती नहीं। सारे सूबे, मतलब पर देश का चक्कर लगाना पड़ता है। जब तक इधर का नंबर आये-आये पांच बरस बीत जाते हैं। रुपये की तरह बरस की कीमत भी बहुत लटक गयी है। दन से ख़तम हो जाता है।
लड़का पानी ले कर आ गया और एम.एल.ए. साहब कुल्ली करने और हाथ-मुंह धोने में लग गये। पर बोलते भी जा रहे थे कि जो वह न बोलते तो इसका ख़तरा था कि नौजवान किसान फिर कोई टेढ़ी बात शुरू कर देगा - अब साइकिल नहीं चलायी जाती। थक जाता हूं। पर क्या करूं, न आऊं तो तुम लोग ताना दोगे।
बूढ़ा किसान बोला - एक ठो मोटर कौन लिजिए। सब झंझटे खतम हो जायी।
एम.एल.ए. साहब आख़िरी कुल्ली करने के बाद बोले - क्या बात करते हो? अरे हम वह नहीं हैं जो मोटर पर चढ़ के इंकिलाब की ख्बर सुनाते फ़िरते हैं। और क़ौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ। जनता तो धूप में जले और जनता का ख़ादिम मोटरों पर दनदनाता फिरे, तो लानत है उस आदमी पर।
बूढ़ा किसान लाजवाब-सा हो गया। बोला - बाकी...
पर एम.एल.ए. साहब भला उसे कहां बोलने देते। बात काट के बोले-न बाक़ी न जमा। इंदिरा गांधी एक दिन हम से खुद बोलीं कि एम.एल.ए. भाई, हमको भाई कहती है। रक्षा बंधन पर जो मैं दिल्ली न जाऊं, तो फूल जाती है, हां तो क्या कह रहा था मैं कि वह एक दिन खुद बोलीं कि एम.एल.ए. भाई, कहिए तो आपको एक आधा मोटर खरिदवा दूं। मैंने कहा, बिटिया मुझे तो माफ़ ही रक्खो। हमको हवाई जहाज पर चढ़ के जनता के दुःख-दर्द का तमाशा देखने का कोई शौक नहीं है। भरी सभा में जो मैंने तड़ाक से यह कहा तो बिटिया का मुंह इत्ता-सा हो गया - वह रुक गये और शेरवानी की जेब से पानों की डिबिया निकाल कर पान खाने में लग गये।
किसान परिवार मुंह खोले इस इंतिजार में कि आगे क्या होगा।
एम.एल.ए. साहब ने पान खाने और डिबिया को जेब में रखने के बाद फिर बात का सिरा थामा - तो बिटिया खिसिया के हंसने लगीं। अरे भई, हम क्यों दबें किसी से। हम सियासत, मतलब राजनीति का काला व्योपार तो करते नहीं। खरे आदमी हैं और खरी बोलते हैं।
नौजवान किसान तक पर रोब पड़ गया। पूछने लगा - आप परधान मंतरी से ई बोल दिया?
वह बोले - क्यों न बोलता। भाई दीनदयाल शर्मा की तरफ़ मुड़ के बोलीं - हम इस साल एम.एल.ए. भाई को टिकट देना चाहते हैं। शर्मा जी पूछने लगे, कितने टिकट दे दूं। मैने पूछा, सनीमा ओनीमा के टिकट की बात हो रही है क्या? इस पर शर्मा जी झेंप गये और बिटिया खिलखिला के हंसने लगीं। जब हंसी ख्तम हुई तब हमने बिटिया से कहा कि हम तो गांधी जी के नाम लेवा हैं। चुनाव हरगिज नहीं लड़ेंगे। पर जो हमको ख़ुश करना चाहती ही हो तो सेठ धरमदास को टिकट दे दो। अब मेरी बात तो वह टाल नहीं सकती थीं। जगजीवन राम, दीनदयाल शर्मा, ए साहब चावन साब ने एड़ी चोटी का ज+ोर लगा दिया कि धरमदास को किसी तरह टिकट न मिलने पाये। पर बिटिया ठन गयी कि एम.एल.ए. भाई ने जिंदगी में पहली मरतबा तो कुछ मांगा है। टिकट तो उसी को मिलेगा, जिसे भाई टिकट दिलवाना चाहेंगे। तो सेठ साहब को टिकट मिल गया और चुनाव का सारा भार मेरे सर आया। अब घूम रहे हैं गांव-गांव वोट मांगते
नौजवान बोला - ए साहब आप का कहा सिर आंख पर। पर हम काहे को वोट दें आपके कहे से? बदले में हम्में का मिलेगा? पिछले चुनाव से पहिले आप बचन दे गये रहे कि चुनाव के बाद हिया ट्युबबेल लग जायेगा। कहां है ऊ ट्युबबेल?
एम.एल.ए. साहब को ताव आ गया। बोले - क्या कही, नहीं लगा वह ट्युबबेल? अभी ख्बर लेता हूं बिटिया की। ज+रा वह बक्सा उतरवाना -
साइकिल के कैरियर से बक्सा उतर कर उनके सामने आया उन्होंने उसे खोला। उसमें एक ड्राई बैट्री सेट था। लकड़ी का एक चौकोर तख्+ाता था जिसमें दो बल्ब लगे हुए थे। दो प्वाइंट्स थे। टेलिफोन का एक चोंगा था। एम.एल.ए. साहब ने चोंगे का प्लग लगाया। तख्+ते को बैट्री से जोड़ा दोनों बल्ब जलने-बुझने लगे किसानों का मुंह खुले का खुला रह गया। पर एम.एल.ए. साहब उनकी तरफ देख ही नहीं रहे थे। वह तो गुस्से में नंबर डायल कर रहे थे। नंबर मिल गया। यह धाड़े - हलो कौन? जगजीवन राम? अरे भई आपसे कौन बात कर रहा है। मैं एम.एल.ए. बोल रहा हूं। नमस्ते नमस्ते। ज+रा प्रियदर्शनी को फ़ोन दीजिए। अब आप प्रियदर्शनी को नहीं जानते? अरे साहब प्रइम मिनिस्टर। वजीरे-आजम। परधान मंत्री। अब समझे कि अरबी फ़ारसी में भी बोलूं? क्या लोग हैं - क्या कहा? सो रही हैं। अरे तो जगा दीजिए साहब। आप क्या मक्खी झल रहे हैं -
उन्होंने किसानों की तरफ देखा जो उनके रोब के बोझ से दबे जा रहे थे। बूढ़ा किसान तो डरा-डरा-सा लग रहा था कि कहीं पता चल गया कि जगजीवन राम पर उसके पास से झाड़ पड़ी है और पुलिस ने पूछ गछ शुरू की तो वह क्या जवाब देगा। बोला - अरे रहे देई, भुला गइल हो इहें, ट्युबबेल कहां भागल जात बा लग जाई।
एम.एल.ए. साहब कहां रुकने वाले थे। बोले-रहने कैसे दूं जी, झूठा तो मैं बना ना - हलो, बिटिया? यह सब क्या आफ़त मचा रक्खी भई तुमने? ऐं? एक ट्युबबेल नहीं लगवा सकती तो परधान मंतरी बनी क्या बैठी हो? इस्तेफ़ा देके छुट्टी करो - नहीं नहीं नहीं, इस बहानेबाजी से काम नहीं चलेगा - अरे अमरीका से ट्युबबेल नहीं आया तो हम क्या करें। तुम तो वहां दिल्ली में बैठी हो, जनता को सामना तो मुझे करना पड़ता है - क्या कहा? मार्च तक ज+रूर लग जायेगा। ठीक है। मार्च में अब कितने दिन रह गये हैं। पर कान खोल के सुन लो कि जो मार्च तक ट्युबबेल न लग गया तो मैं फ्लोर क्रास करके अपोजिशन में मिल जाऊंगा और जो मैं अपोजि+शन में चला गया तो समझ लो कि न तुम्हारी पार्टी की ख़ैर है न तुम्हारी सरकार की - हाँ, हाँ, ठीक है। अब बंद करो फोन, तुम्हें तो कोई काम-धाम है नहीं, बस फोन ले कर बैठ गयीं।
एम.एल.ए. साहब ने फ़ोन रख दिया और डरे हुए किसानों की तरफ़ देखकर उदासी से मुसकराते हुए बोले - तुम लोगों की वजह से झाड़ पड़ गयी बिचारी पर। मगर अब मार्च नहीं तो अपरैल तक ट्युबबेल ज+रूर लग जायेगा।
उन्होंने बक्सा बंद किया। उसे नौजवान किसान की तरफ सरकाते हुए बोले - ज+रा इसे साइकिल पर चढ़ा दो। नौजवान किसान का सारा विरोध ख़त्म हो चुका था। जो आदमी प्रधान मंत्री को डांट पिला दे उससे डरना चाहिए।
तो एम.एल.ए. साहब अपने टेलिफोन समेत साइकिल पर चले गये और कम्युनिस्ट पार्टी यह सोचती रह गयी कि लोगों को यह कैसे बतायें कि फोन यूं नहीं किये जाते। सुनेगा कौन, क्योंकि यह तो आंखों देखी बात थी। जब तक पार्टी वालों को पता चले यह बात जंगल की आग की तरह फैल गयी कि प्रधान मंत्री पर एम.एल.ए. साहब की डांट पड़ गयी और उन्होंने खुद वादा किया है कि मार्च में ट्युबबेल लग जायेगा।
चुनाव का नतीजा क्या निकला यह मुझे नहीं मालूम। पर मैं सोच में पड़ गया। यह एम.एल.ए. साहब तो बहुत ही दिलचस्प आदमी हैं। यानी यह आदमी तो कहीं रुकने वाला ही नहीं, धूल में रस्सी बटने की कहावत भी साफ़ समझ में आ गयी और जी चाहने लगा कि एम.एल.ए. साहब से मिला जाये। पर जिंदगी के अपने चक्कर होते हैं। आदमी जिससे मिलना चाहता है उसी से नहीं मिल पाता और जिनसे नहीं मिलना चाहता उनसे बार-बार मिलना पड़ता है और हर बार यह साबित करना पड़ता है कि उनसे मिल कर बड़ी खुशी हुई।
जिंदगी की तमाम भाग-दौड़ के बावजूद एम.एल.ए. साहब मेरे दिमाग़ के एक कोने में पड़े रहे और मैं उनके बारे में सोचता रहा। पर उनसे मिलने की कोई शक्ल न निकली क्योंकि हम दोनों के क्षेत्र अलग-अलग थे। वह राजनीति के ट्रेव्लिंग एजेंट थे। उठल्लू चूल्हे। आज यहां और कल वहां और चूंकि राजनीति उनका आदर्श नहीं थी बल्कि केवल पेशा थी इसलिए उनका कोई एक मंच भी नहीं था। जैसे रंडियां मुजरे का बीड़ा लेती हैं। वह चुनाव का बीड़ा लिया करते थे। उन्हें इससे मतलब नहीं था कि चुनाव लड़ कौन रहा है। जनसंघ से लेकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी तक वह सबका चुनाव लड़ाने को तैयार रहते थे और चुनाव लड़ाते तो ऐसा कभी नहीं लगता कि वह किराये पर लाये गये हैं। लगता कि जो कुछ कह रहे हैं वही उनके दिल में है। उनके जानने वाले उनके रेल-टिकट को देख कर भांप लिया करते थे कि चुनाव कहीं होने वाला है? फ़र्स्ट क्लास में सफर करते तो बताये बिना लोग जान लेते कि चुनाव कम-से-कम असंबली का है। सेकेंड में दिखाई देते तो इसका मतलब यह निकलता कि चुनाव म्युनिसिपैलिटी या टाउन एरिया का है। थर्ड में होते तो मतलब यह कि अपने किसी काम से मजबूरन यात्रा कर रहे हैं।
कवि कवि सम्मेलन मारते हैं मां-बाप चांटा मारते हैं। पहलवान दंगल मारते हैं। छैले आंख मारते हैं। अमरीका वाले बम मारते हैं। एम.एल.ए. साहब चुनाव मारा करते थे।
चुनाव के दिन आते तो महीनों पहले से उनकी आव भगत शुरू हो जाती। भांत-भांत के लोग उनके घर पर दिखाई देने लगते मोल-तोल शुरू होता। चाय चल रही है। पुराने चुनावों के हथकंडे सुनाये जा रहे हैं और साथ ही साथ एम.एल.ए. साहब यह भांपने में लगे हैं कि असामी कितने में कटेगा - एक आध बार तो ऐसा भी हुआ कि एम.एल.ए. साहब को पता चलता कि उन्होंने एक ही कास्टिटुएंसी के दो उम्मीदवारों से पैसे ले लिये हैं। अब वह धर्म-संकट में पड़ जाते। पर वह आदमी नमक हराम नहीं थे। थे? देखिए यह बताना तो भूल ही गया कि एम.एल.ए. साहब का देहांत हो चुका है और यह लेख नहीं श्रदांजली है। उन्हें थे लिखना बड़ा अजीब लग रहा है। हो सकता है कि ऊपर भी कोई चुनाव हो रहा हो और एम.एल.ए. साहब ने यहां का बीड़ा ले लिया हो। क्योंकि जो आदमी इतना जीवित हो वह मर कैसे सकता है।
उनके मर जाने से भारतीय डिमाक्रेसी का इतना बड़ा नुक़सान होगा कि मैं कह नहीं सकता। क्योंकि उनके सिवा भारत में मुझे कोई पक्का राजनीतिक दिखाई ही नहीं देता। चुनाव उनका पेशा भी था और जिंदगी भी। चुनाव हारने या जीतने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं थी और यही उनका सबसे बड़ा गुण था।
क्योंकि घपले तो चुनाव हारने या जीतने के बाद ही शुरू होते हैं। जो जीत जाते हैं वह घूस खाना शुरू कर देते हैं और जो हार जाते हैं वह डिमाक्रेसी बचाओ आन्दोलन चलाने में लग जाते हैं और उस वक्त तक यह आंदोलन चलाते रहते हैं जब तक कि खुद चुनाव न जीत लें, चुनाव जीत कर वह घूस खाने में लग जाते हैं और डिमाक्रेसी बचाओ आन्दोलन उनके हाथ में आ जाता है जो अब चुनाव हारे हैं।
यही कारण है कि एम.एल.ए. साहब कभी भारतीय प्रजातंत्र के भविष्य से मायूस नहीं हुए। उनका कहना था कि कोई-न-कोई तो चुनाव हारेगा वह अगले पांच बरसों तक प्रजातंत्र बचाओ आंदोलन अवश्य चलायेगा क्योंकि यदि इस बीच में प्रजातंत्र का देहांत हो गया तो फिर उन्हें चुनाव जीतने का अवसर ही नहीं मिलेगा।
उनका थीसिस यह था कि भारत में प्रजातंत्र चुनाव हारने वालों की अथक कोशिशों की वजह से बचा हुआ है और साहब आप बुरा मानें या भला, इस मामले में मैं एम.एल.ए. साहब से सहमत हूं।
सुना है कि मरने से कुछ ही दिनों पहले वह एक आल इंडिया चुनाव हारन कमेटी के नाम से एक अखिल भारतीय पार्टी बनाने की सोच रहे थे और इस सिलसिले में बहुत से सुप्रसिद्ध चुनाव हारने वालों से उनकी बातचीत चल रही थी। यदि यह पार्टी बन गयी हो तो यह अपनी तरह की पहली पार्टी होती और विश्व राजनीति के इतिहास में उनका नाम सोने के अक्षरों से लिखा जाता, पर उनका नाम था क्या? उनके पिता के सिवा उनका नाम किसी को याद नहीं, क्योंकि तमाम लोग उन्हें एम.एल.ए. साहब ही के नाम से जाना करते थे। उनकी पत्नी तक उन्हें एम.एल.ए. साहब ही कहा करती थीं। मैंने वोटरों की लिस्ट देखी तो पता चला कि उसमें उनका नाम ही नहीं है, वह वोटर बने ही नहीं। उनका कहना था कि जो वह वोटर बने तो किसी-न-किसी उल्लू के पट्ठे को वोट देना ही पड़ेगा और वह किसी को इस लायक़ ही नहीं समझते थे कि उसे वोट दिया जाये।
बहुत छानबीन के बाद पता चला कि उनका नाम लतीफ़ अहमद था। नास्तिक थे इसलिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मौलाना कहे गये। जल्दी में पुकारना हो तो मौलाना लतीफ अहमद पुकारने में देर लगती थी और जब तक नाम पूरा हो, यह एक-आध फर्लांग निकल जाया करते थे, क्योंकि इन्हें तेज चलने का खब्त था। ख़ाली मौलाना पुकारो तो डिपार्टमेंट ऑफ थियालोजी का कोई विद्यार्थी मुड़ पड़ता। उन दिनों यूनिवर्सिटी में १० या ११ लतीफ़ अहमद थे। तो मौलाना लतीफ़ अहमद को जल्दी में पुकारने लाय+क बनाने के लिए एम.एल.ए. कर दिया गया।
पहली जनवरी १९२२ को सवेरे चार बजे पैदा हुए।
इकत्तीस दिसंबर १९७४ को मरे।
होश संभालने से लेकर होश गवाने तक केवल चुनाव लड़ाते रहे।
उन्होंने अपने पीछे एक बाप, दो माएं और एक पत्नी छोड़ीं।
एक आदमी की पूरी जि+ंदगी इन तीन जुमलों में आ गयी। तीन जुमले भी मरने के बाद मिलते हैं। जिं+दगी तो एक जुमले में आ जाती है। जन्मदिन - जो शायद इसलिए महत्त्वपूर्ण होता है कि उसके सहारे मरने के दिन गिनने में आसानी होती है।
पर एम.एल.ए. साहब चुनाव हारने वालों को सदा याद आते रहेंगे। उनके मर जाने से चुनाव का मजा आधे से कम रह गया। भारतीय प्रजातंत्र को उतना नुकसान श्रीमती गांधी या श्री जयप्रकाश नारायण मिल-मिला कर भी नहीं पहुंचा सकते, उसे उतना नुकसान मौत के फ़रिश्ते ने पहुंचा दिया। मैं मांग करता हूं कि उनकी मौत की छानबीन की जाये। मुझे तो इसमें साफ़ सी०आई०ए० का हाथ दिखाई देता है और यदि ऐसा नहीं तो फिर यह काम - जाने दीजिए। नाम लेने से क्या फ़ायदा। पाकिस्तान के स्वर्गवासी डॉक्टर तासीर का एक शेर याद आया -
दावरे-हश्र मेरा नामये-आमाल न देख।
इसमें कुछ पर्दानशीनों के भी नाम आते हैं॥

राही मासूम रजा की कहानियां: मनुष्य के ख्वाबों की तावीर

- प्रताप दीक्षित


राही मासूम रजा के निधन के १६ वर्षों बाद उनकी याद और उनके साहित्य का पुनर्मूल्यांकन इसलिए और महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि आजादी के ६० साल बाद भी वे दारूण स्थितियां, जिनके विरुद्ध राही ने कलम उठाई थी ज्यों की त्यों मौजूद हैं। आजादी का वास्तविक स्वरूप और मूल्य स्थापित नहीं हो सके। मनुष्य के विरोध में उभरने वाली शक्तियां और प्रखर हुई हैं। सामाजिक-राजनीतिक मूल्य लगातार विघटित हुए हैं। जातिवाद और साम्प्रदायिकता की स्थितियां बद से बदतर होती गई। प्रगति, आर्थिक विकास और धर्म के नाम पर किया जाने वाला शोषण और आम मनुष्य की उपेक्षा युग सत्य बन गए। ऐसी स्थिति में राही मासूम रजा का साहित्य इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से इन स्थितियों के खिलाफ संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी देश और समाज को जाति, धर्म, सम्प्रदाय और भाषा के आधार पर विभाजित करने वाले राजनीतिकों, तथाकथित समाजसेवियों और छद्म बुद्धि जीवियों का सतत्‌ विरोध करते रहे। अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण उन्हें हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही सम्प्रदाय के कट्टरपांथियों के विद्वेश का शिकार होना पड़ा। साहित्य के इतिहास में, संभवतः कबीर के बाद, राही पहले साहित्यकार है जिन्हें ऐसी हालातों से गुजरना पड़ा। उनके संघर्ष के अनेक प्रसंग हैं। अपने विचारों के चलते मुस्लिम विश्वविद्यालय की नौकरी उन्हें छोड़नी पड़ती है। मुफलिसी के दिनों में पत्नी प्रसव हेतु अस्पताल में थी। लेखक मित्रों कमलेश्वर, भारती, कृष्णचन्दर की मदद से अस्पताल का बिल भरा गया। बम्बई में किसी तरह काम मिलने का सिलसिला शुरू होता है लेकिन न तो राही की बेबाकी कम होती है न ही संघर्ष। यहाँ तक कि हिन्दी के एक प्रसिद्ध लेखक द्वारा संचालित प्रकाशन समूह द्वारा प्रकाशित उनके उपन्यास आधा गाँव की पूरी रायल्टी भी नहीं दी जाती। जोधपुर विश्वविद्यालय में उनके उपन्यास ''आधा गाँव'' को तत्कालीन विभागाध्यक्ष नामवर सिंह के समर्थन के बाद भी बिना नामवर सिंह की सहमति के पाठ्यक्रम से हटा दिया जाता है। राही बदनीयती से कभी समझौता नहीं कर पाए। कम्युनिष्ट पार्टी के सदस्य होते हुए भी जब केरल में साम्यवादी पार्टी द्वारा सरकार बनाने के लिए मुस्लिम लींग से गठबंधन किया गया तब पार्टी मेंबर होते हुए भी उन्होंने इस गठबंधन का कड़ा विरोध किया। जनसंघ और मुस्लिम लींग दोनों ही उनकी दृष्टि में साम्प्रदायिक हैं। उनकी साफगोई दूसरों के लिए ही नहीं वरन्‌ स्वयं के संबन्ध में भी है। एक साक्षात्कार में वह अपने फ़िल्मी लेखन के संबन्ध में स्वीकार करते हैं...मैं जानता हूँ कि फ़िल्मों में घटिया लेखन कर रहा हूँ। सब-स्टैर्ण्ड काम करता हूँ ताकि जी सकूं। जियूंगा तभी तो कुछ लिख सकूंगा। मुझे इसकी कोई शर्म नहीं। परन्तु फ़िल्मों में जो लिखना चाहता हूँ वह तो अभी लिख ही नहीं सका।
राही मासूम रजा के साहित्य के विवेचन के परिप्रेक्ष्य में इन स्थितियों और संघर्षों का आकलन इसलिए आवश्यक प्रतीत होता है कि किसी साहित्यकार का संपूर्ण लेखन उसके विचारों, जीवन-दर्शन और संघर्षों का ही आइना होता है।
राही मासमू रजा मूलतः उपन्यासकार के रूप में जाने जाते हैं। यह अल्पज्ञात तथ्य है कि वह एक संवेनशील कवि और सशक्त कहानीकार भी थे। उनकी कविताओं का प्रभाव उनके उपन्यासों, उनके पात्रों और कहानियों पर परिलक्षित होता है। अपने उपन्यासों के प्रकाशन के पूर्व वह कवि के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे।
राही का कोई कहानी संग्रह संभवतः प्रकाशित नहीं हुआ है। राही साहित्य के अध्येताओं और शोध करने वालों ने भी उनकी कहानियों के संबंध में कोई चर्चा नहीं की है। राही की कहानियां तत्कालीन पत्रिकाओं सारिका, धर्मयुग, रविवार आदि में बिखरी हुई हैं। राही की पहली कहानी तन्नू भाई शीर्षक से है जो उन्होंने १७ वर्ष की आयु में १९४४ में लिखी थी। पाठकों को ज्ञात होगा कि तन्नू भाई उनके उपन्यास आधा गाँव का एक पात्र है। साहित्य के अध्येता जानते हैं कि प्रत्येक कहानी में एक उपन्यास की संभावना और हर उपन्यास के प्रत्येक पात्र की अपनी कहानी होती है।
कहानी और उपन्यास के बीच अन्तर के सैद्धन्तिक प्रश्न को यदि विद्वजनों के लिए छोड़ दिया जाए और विषय को केवल लेखक की कहानियों तक सीमित करें तब भी यह तो तय है कि समय के संग्रहलय में किसी रचनाकार की एक रचना भी बची रह जाती है तो साहित्य के इतिहास में लेखक का नाम अक्षुण्ण हो जाता हैं।
समीक्षकों ने राही मासूम रजा के साहित्य को साम्प्रदायिकता के विरूद्ध एक जेहाद के रूप में परिभाषित किया है। इस कथन से असहमत नहीं हुआ जा सकता। परन्तु राही की कहानियों से लेखक की संवेदना के विविध आयाम उद्घाटित होते हैं। मनुष्य के स्वप्न, अभाव, शोषण, रिश्तों की संवेदनहीनता, मनुष्यता की अवमानना तज्जनित उसके अकेलेपन का चित्रण उनकी कहानियों में मिलता हैं। यहाँ तक कि आज की सर्वग्रासी विभीषिका बाजारवाद का भी उन्होंने पूर्वालोकन कर लिया था।
दरअसल किसी साहित्यकार के रचनात्मक संघटन में इतिहास, परिवेश और उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि का प्रभाव होता है। परन्तु सभी के लिए अपने समय के दौर की रचनात्मकता के साथ आसान नहीं होता। कारण इतर हैं। जरूरत होती है। संघर्षगामिता, प्रखर दृष्टि और ईमानदारी की। राही नई-नई मिली आजादी या कहा जाए सत्तापरिवर्तन के समय युवा हुए थे। वह देश के बटवारे को कभी स्वीकार नहीं कर सके। आजादी के बाद के हालातों साम्प्रदायिकता, विषमता, शोषण, भ्रष्टाचार के कारण आम आदमी के लिए जलालत के अतिरिक्त कुछ बचा था तो उसकी आँखों में अधखिले सपने और एक विशाल जनसमूह उन सपनों की भी असामयिक मृत्यु के लिए अभिशप्त हो गया। राही की कहानियां इन सबके लिए जिम्मेदार शक्तियों को कटघरे में खड़े करने की कोशिश हैं।
राही मासूम रजा की कहानियों के परिपे्रक्ष्य में उनका साहित्य दो ध्रुवों पर स्थित दिखाई देता हैं। एक छोर पर उनकी कहानियाँ साम्प्रदायिकता, सामाजिक-राजनीतिक असमानताओं, पूंजीवादी पतनशीलता से जुड़े उपभोक्तावादी मूल्यों के खिलाफ एक अनवरत युद्ध है जो सपनों को सच करने के लिए लड़ा जा रहा है। क्योंकि कोई भी व्यवस्था स्वतंत्रता, न्याय, समता आदि की व्याख्या अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए अपने ढंग से करती है। लेखक की नियति उससे टकराना है।
दूसरी ओर उनकी कहानियों में जगह-जगह पर ख्वाबों, परछाइयों,धुंध और सन्नाटे हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से वह मिथक, इतिहास और संस्कृति में मानवीय अस्मिता की तलाश करते नजर आते हैं। चम्मचभर चीनी में पौराणिक प्रसंग को लेखक वर्तमान संदर्भों से जोड़ता है। देवताओं ने समंदर को मथा/जहर भी अमृत भी मिला/ मथे मेरी तरह/एक कतरे को जरा/किसने अपने को मथा/मेरे सिवा/मेरे ही जैसे दीवानों की तरह।
दिल एक सादा काग़ज-खोए हुए सपनों और परछाइयों की तलाश का प्रयास है। जैदी विला एक ऐसा प्रतीक है जिसके माध्यम से लेखक अपनी आत्मा, जमीन, इसांनियत खोज रहा है।
राही की कहानियों में आत्मा पर चढ़ी धूल है, खुशबू में बसा अंधेरा है, यादे हैं, चाँदनी आँखों की अफ्‌सुरदा है, बिछुड़ गई परछाइयाँ है, सहमी खामोशी है, सिकुड़ गए सपने हैं, चुटकी भर नींद है। परन्तु मंजिल दूर है। अब तो कृष्ण भी परदेश गया है। राही को ही अपने खूने दिल से राहों पर फूल खिलाने हैं।
प्रेमचन्दोत्तर कहानी ने कई पड़ाव पार किए। उस समय समाज जिस ध्रुवहीनता में धूम रहा था, कहानी उसी में रास्ता तलाश रही थी। कहानी की अन्तर्वस्तु और स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आए। तमाम कथा आन्दोलनों से परे कहानियों के संबंध में राही की अपनी मान्यताएं हैं उनका मानना है कि कथाकार के लिए जरूरी है कि वह उन लोगों को अच्छी तरह जानता हो जिनकी वह कहानी सुना रहा है। वह यह भी मानते हैं कि साहित्य में मूल प्रश्न वास्तविकता का नहीं बल्कि वास्तविकता की तरफ़ लेखक के दृष्टिकोण का होता है। राही के कथा साहित्य के विश्लेषण से मालूम होता है कि उन्हें इतिहास और संस्कृति की गहरी समझ है। उनकी रचनाओं में मूल्यों की स्थापना का कथात्मक प्रयास है। उनकी कहानियों में जीवन की गहरी और व्यापक समझ पाई जाती है।
उनकी कहानियों की रचना प्रक्रिया के संबंध में राही की पहले प्लाट सोच कर कहानी लिखना नहीं पसंद करते। दृष्टव्य है कि फ्रांसिस विवियन ने भी दृढ़ता से प्लाट का विरोध किया था। उनकी कहानियों के केन्द्र में कोई व्यक्ति या चरित्र होता है। लेखक की श्रद्धा मानवीय संवेदना में है जिसका केन्द्र मनुष्य होता है। विचार भी इसी माध्यम से आते हैं। राही के अनुसार जीवन के विषय में एक दृष्टिकोण के बिना अच्छी कहानी नहीं लिखी जा सकती। वह कहते हैं कि यदि कहानी युग की सीमाओं को नहीं पार कर पाती तो समाप्त हो जाती है।
राही मासूम रजा की जो भी कहानियां उपलब्ध हो सकी हैं ये उनके कथा साहित्य का प्रतिनिधित्व तो नहीं करती परन्तु इनके आधार पर उनके सपनों, संघर्ष और विचारों की बानगी अवश्य मिलती है।
चम्मचभर चीनी राही मासूम रजा की १९७६ में प्रकाशित कहानी है। फंतासीनुमा इस कहानी में जीवन की कड़वाहटें, टूटते सपने और अभाव हैं। एक ओर यह मनुष्य के मोहभंग की कहानी है तो दूसरी ओर अटूट जिजीविषा की।
कथ्य की दृष्टि से यह लेखक और उसके मित्र की कहानी है। मित्र जीवन की विसंगतियों और अभावों को स्वीकार नहीं कर पाता। कड़वाहट मिटाने के लिए चम्मचभर चीनी की ही दरकार है, जो है वह चाय के प्याले में मिठास भरने के लिए पर्याप्त नहीं है। लगता है कि यह मित्र लेखक का अपना ही अक्स है। अन्त में लेखक आजिज आकर आइने पर दावात फेंककर मारता है। आइना टूटने से वह राहत महसूस करता है। सन्नाटा चम्मचभर चीनी बन जाता है और चाय मीठी हो जाती है।
चम्मचभर चीनी जीवन के अभावों, कड़वाहटों और मनुष्य के टूटते सपनों को बचाने की कोशिशों का प्रतीक है। बंद आँखों से देखे गए ख्+वाबों की कहानी। क्योंकि खुली आँखों के सामने जो यथार्थ आता है उसमें जीना मुश्किल हो गया है। समय या तो स्थगित हो गया है या अतीत की ओर चलने लगा है। भविष्य की ओर जाने वाले सभी रास्ते बंद हो चुके हैं। आम आदमी विवश हो गया है ख्वाबों और कविता के अन्दर जीने के लिए। इनके बाहर जो यथार्थ है उसका सामना वह नहीं कर सकता। कविता के बाहर की जि+न्दगी उसके लिए नहीं है।
मंहगाई के बीच सस्ता सिर्फ़ मनुष्य हुआ है। एक चम्मच में बोरी की बोरियां चीनी समा जाती है लेकिन चम्मच नहीं भरती। इस बाजार में हाथ की कीमत एक चम्मच चीनी है। जो कभी भरती नहीं। यह एक चम्मच चीनी मनुष्य की अस्मिता, आत्मा और सपने हैं जिसकी कीमत किसी बाजार में नहीं लगाई जा सकती। जिसका खालीपन कोई बाजार व्यवस्था नहीं भर सकती। बाजारवाद के विरुद्ध, लिखी गई, संभवतः पहली कहानी है।
लेखक बायां हाथ खरीदना चाहता है। क्योंकि उसका बायां हाथ बरसों हुए सुन्न हो चुका है। दाहिना तो पहले ही सलाम करते करते थक चुका है। उससे तो उम्मीद की नहीं जा सकती। लेखक का यह व्यंग्य उन छद्म वामपंथियों पर प्रतीत होता है जो स्वयं जमाने से इस बाजार संस्कृति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। लेखक पूंजीवादी पतनशीलता से जुड़े उपभोक्तावादी मूल्यों पर प्रश्न खड़े करता है।
अंत में मिठास आती है, हाथ में जान भी। परन्तु आइना टूटने के बाद। आइना ही तो आत्म साक्षांत्कार है। आइने में व्यक्ति अपनी ही शक्ल देखता है। आत्ममोह व्यक्तिवाद की ओर ले आता है। बाजार का दबाव भी यही करता है। मनुष्य को खण्डों में विभाजित करता है। आत्ममोह के आइने को तोड़ कर ही बूंद और अपने को मथा जा सकता है। जीवन में मिठास भरने के लिए अपने से बाहर आना ही होगा।
यह छोटी-सी कहानी गहरी विचार दृष्टि और महाकाव्यों की गइराई अपने में संजोए हुए है।



सपनों की रोटी व्यवस्था के शव विच्छेदन की कहानी हैं । समाज, राजनीति और व्यवस्था के अन्तविरोधों पर व्यंग्य कथा लगती यह कहानी राही की अन्य रचनाओं की भाँति मनुष्यता की तलाश कहानी है। अथवा कहा जाए कि एक प्रकार से मनुष्य के सपनों की अथवा स्वयं की खोज की कहानी है।
कहानी का कथानक छोटा लेकिन इसका फलक बड़ा है। कहानी का मुख्य पात्र एक लेखक है जिसकी एक जेब में पी-एच०डी० की डिग्री और दूसरी में उसके लिखे नए उपन्यास के कुछ पन्ने हैं। वह स्वयं कहीं गुम हो गया है। तलाश उसी को करनी है। लेखक इस खोज के माध्यम से राजनीति, मंहगाई, सरकारी तन्त्र, भ्रष्टाचार, सरकारी नौकरियों की स्थिति और यथार्थ, लोगों की सोच का यथार्थ विश्लेषण करता नजर आता है। अपने को कहीं न पाकर अन्त में वह सोचता है कि शायद वह मर चुका है जिसकी उसे ख़बर नहीं हुई हैं। वह निराश लौट कर पलंग पर अपने को सोए हुए पाता है। उसे इत्मीनान होता है कि यदि वह सो रहा है तो वह सपने भी देख रहा होगा। ग़नीमत है कि उसके सपने तो सुरक्षित हैं।
लेखक इस कहानी में व्यवस्था पर निरन्तर कटाक्ष करता है-अगर मुसलमान अपना घर जलवाने, अपने आपको कत्ल करवाने के लिए दंगा शुरू कर सकते हैं तो, सरकारी नौकरी क्यों नहीं कर सकते।''
ज्ञातव्य है कि मुसलमानों पर इस तरह के आरोप केवल साम्प्रदायिक पार्टियों द्वारा ही नहीं वरन्‌ प्रशासन द्वारा भी लगाए जाते रहे हैं। (संदर्भ-विभूति नारायण राय द्वारा इस विषय पर लिखा गया शोध प्रबंध )
इसी प्रकार जातिवाद पर व्यंग्य है-जातिवाद तो साहब हजारों बरस पुराना है। पुरानी शराब है, छूटती नहीं है मुंह से काफी लगी हुई। लेखक बीसवीं सदी में वैज्ञानिक सोच की जगह धर्म की विडम्बना पर व्यंग्य करता है, नौकरी तो उन्हें मिलेगी तो ब्लैड बोर्ड पर श्री, ऊँ० या बिस्मिल्लाह लिख कर फिजिक्स पढ़ाना शुरू करें।
त्रासदी तो यह है कि आम आदमी ने यह दंद फंद सीखे नहीं हैं। सपने देखने के सिवा। लेकिन अब तो सपनों का बाजार भी मंदा पड़ रहा है। जिंदगी बाजार का उतार चढ़ाव होकर रह गई है। यह विडम्बना ही तो है कि मनुष्य की पहचान के लिए जाति और धर्म ही सबसे बड़े गुण बन गए हैं। उसका सिर्फ़ मनुष्य रहना महत्त्वहीन है। जरूरी है कुछ और होना।
सपने, ख्वाबों की तासीर, आत्मा, चीनी मिठास के लिए आदि राही के प्रिय प्रतीक हैं। अपने अंदर गहरे अर्थ और संदर्भ संजोए हुए ऊपर से साधारण से दिखते शब्द मात्र। चीनी की मिठास आत्मीयता की तलाश है। वह रोटी से ज्+यादा सपनों को मनुष्य के लिए आवश्यक मानते हैं। रोटी के बिना मनुष्य कुछ दिन जिंदा रह सकता है। न मिलने पर वह, अधिक से अधिक मर जाएगा। परन्तु यह मृत्यु मनुष्य की होगी। परन्तु सपनों के बिना मनुष्यता ही मर जाएगी। तभी मनुष्य के लिए सपने ज्यादा जरूरी हैं। सपनों के जिन्दा रहने पर बदलाव की संभावना तो रहेगी।
राही की कहानियों में मानवीय जिजीविषा बरकरार रहती है। कहानी के अंत में कहीं चीनी मीठी हो जाती है, कहीं विषम से विषम स्थिति में वह सपनों में खो जाता है।
कथायात्रा के इस क्रम में लेखक की अगली कहानी जो इसी भावभूमि की है वह है-खुश्की का टुकड़ा। यह कहानी मनुष्य के अकेलेपन, उसकी खो गई हँसी, आत्मा की तनहाई के साथ-साथ पूरी उदास पीढ़ी की कहानी है।
कहानी का कथ्य कुछ यूं है-यह उस अकेले और उदास नायक की कहानी है जिसकी आत्मा की तनहाई उसकी पीढ़ी की तकदीर है। इस अकेलेपन से बचने का एक ही उपाय है-यादों में जो खो जाना। अकेलेपन से उदासी और झुंझलाहट रूप बदल-बदल कर आते हैं। रूप बदलना और चेहरे पर चेहरे लगा लेना तो मनुष्य की नियति हो गई है। वह इतना कृत्रिम हो गया है कि बिना मुखोटों के वास्तविक रूप में तो उसे कोई पहचानता भी नहीं। सबके चेहरे, मुस्कानें, हंसी सब नकली हैं। उस आम आदमी की आत्मा को शायद यह नकलीपन गवारा नहीं। वह अपनी नकली मुस्कान एक कबाड़ी को बेच देता है। फिर एक दिन बेइन्तिहा-सा हंसना शुरू कर देता है। शायद यही उसकी असली हंसी है। एक दिन उसकी पत्नी उसकी वही नकली हंसी कबाड़ी से वापस ले आती है। परन्तु कथानायक को वह नकली, एडेल्ट्रेड, इन्फीरियर हंसी नहीं पसंद है। पत्नी रूठ कर मायके चली जाती है। नायक रूठी पत्नी को मनाने के लिए पत्र लिखने के लिए काग़ज ढूढ़ रहा है तभी उसके हाथ पत्नी के कहकहों का सेट'' लग जाता हैं, जो वह भूल गई है। कहकहों का सेट उसके हाथ से फिसल जाता है और हंसी रोशनी की लकीर की तरह निर्बाध बहती रहती है। वह बचाने के लिए हाथ बढ़ाता है परन्तु हंसी का सेट हाथ नहीं आता परन्तु सड़क उससे टकरा कर टूट जाती है।
लेखक की इस कल्पना ,फैंटेसी में कई आयाम हैं। एक ओर यह आदमी के मौलिक अकेलेपन की गाथा है। परन्तु इसमें नई कहानी आन्दोलन के बाद की कहानियों की तरह अकेलेपन को ग्लोरीफाई नहीं किया गया है। यह परिस्थितियों के कारण उस पीढ़ी की नियति बन गई है। हर पीढ़ी के साथ उसकी उदासी जन्म लेती है। इससे निजात तो यादों में ही मिलेगी। लेखक आज की दुनिया में जिस विडम्बना की ओर इंगित करता है कि उसे उसके वास्वतिक स्वरूप में नहीं पहचाना जाता। लेखक बिटविन दी लाइन्स मानो कहना चाहता है कि जाति,धर्म पद, प्रतिष्ठा आदि उसकी पहचान बन गए हैं। लोग एक दूसरे को चेहरे पर चढ़ाए चेहरों से पहचानते हैं। चेहरे ही नहीं लोगों की हंसी, मुस्कान भी नकली हैं।
इस अकेले और अजनबी व्यक्ति के पास है अपना कहने को तो उसकी यादें और अपना एकांत सुख, अपनी हंसी। अगर वह भी खो जाए तो वह क्या करें। हर एक तो नकली चेहरे और नकली मुस्कान के साथ जिंदा नहीं रह सकता। परन्तु उसकी असली हंसी कहीं न कहीं सुरक्षित तो रहती है। यही लेखक का मंतव्य है। कहानी में रिश्तों की कोमलता बरकरार रखने और उसमें ताजगी के लिए कथानायक की पत्नी का कथन न केवल मौजू है बल्कि दिशा भी देता है-दिल में हाथ डाल कर नया पति तुमसे भी एक दिन पुराना पति निकाल लेती हूँ। शायद पे्रम में ही तासीर है कि जैसे-जैसे पुराना होता है वैसे गहरा होता है। यही कारण है कि हंसी न केवल पति पत्नी के बीच वरन्‌ इस दुनिया में भी रोशनी की लकीर की मानिन्द होती है। इसीलिए उसको तो इस दुनिया में बचाना ही होगा। कहकहों के सेट के लिए चाहे जिस हद तक झुकना पड़े। मनुष्य की हंसी से टकरा कर परिवेश-सड़क-इसमें बाधक ही टूटेगें। मनुष्य की हंसी नहीं। अपने समस्त अकेलेपन, कृत्रिमता, अभावों के बाद भी नायक, उपेक्षित-द्विविधाग्रस्त सही, अपनी मानवीय हंसी के कारण अपराजेय है। कबीर भी कब मरा है। हम न मरिब, मरिहै संसारा
एक जंग हुई थी कर्बला में- प्रकाशन सारिका-जून, १९७० इतिहास का वह कारुणिक प्रसंग जो काल के प्रवाह में पौराणिक आख्यान एवं मनुष्य की श्रद्धा और आस्था का संबल बन चुका है। उसको लेखक ने एक संवेदनशील कथा माध्यम से प्रस्तुत किया है। यह छोटी-सी रचना संसार के तमाम महाकाव्यों की गइराई समेटे हुए है जिनमें शिखर पर आसीन ज्योतिपुंजों के जीवन को इतनी निकट से देखकर रचा गया है।
कहानी का मदीना संसार के कोटि-कोटि जनों की आस्था का केन्द्र जैनब के नाना मुहम्मद का मदीना है। यह मदीना नहीं जैसे बाहें फैलाए खड़ी माँ है। जैनब की आँखें भर आती हैं। पर रोना किस लिए? आँसुओं की नदियों तो सूख चुकी हैं। ऐसी माएँ ही बहादुर संतानो को जन्म देती है। सिर न झुकाने वाले हुसैन, जिनका नाम ही अमृत बन कर रगों में दौड़ने लगा है, वह कभी मर कैसे सकता है? ऐसे ही शहीदों की शहादत मृत्यु से अमृत की ओर गमन करती है। इसमें उस माँ फातिमा की यश गाथा है जिसने बेटे को चक्की पीस-पीस कर पाला है और सिर बुलंद करने का सबक सिखाया है। उस बहन जैनब का त्याग औेर हिम्मत की जिसने अपने पुत्रों का बलिदान कर दिया और चाहती थी यह सब अपनी आँखों से देखें।
इस छोटी-सी रचना में मनुष्यता, उसके संघर्ष, जिजीविषा और अपराजेयता का इतिहास संजोया गया है। रचना का आप्त वचन है-सिर न झुकाना मनुष्य का अधिकार है। मैं केवल इस अधिकार के लिए लड़ना चाहता हूँ।
यह एक ऐसा युग सत्य है जो सदा सदा सृष्टि के अस्तित्व तक मनुष्य को प्रेरणा देता रहेगा। मृत्यु पर विजय का घोषणापत्र बना रहेगा। इसके साथ ही एक करूण त्रासदी भी है कि न्यायपथ पर चलने वाले को अकेला रह जाना पड़ता है। खुद जल कर दूसरों को रोशनी देनी होती है। चाहे वह आसमान में सूरज हो या कर्बला में हुसैन। अन्याय के सामने सिर न झुकाने वाले हुसैन का सिजदे में झुका सिर कटने के बाद भी नीचा नहीं होता। सूरज के मानिंद आसमान पर बुलन्दियों पर दिखाई देता है।
सहज संवेदनशील कहानी न केवल इतिहास पर नए दृष्टिकोण से प्रकाश डालती है वरन्‌ अपराजेयता का संदेश भी देती है।
राही मासूम रजा ने कहा है कि उनकी कहानियों का आधार व्यक्ति होता है। व्यक्ति केन्द्रित कहानियों में लेखक कहानी के पात्र अथवा चरित्र की पहचान उसके परिवेश, जीवन दशाओं और उसके विचारों में आए परिवर्तनों का समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक अध्ययन करके करता है। इस प्रकार की कहानियों में कहानी और रेखाचित्र का अंतर बनाए रखना, रचनाकारों के लिए मुश्किल होता है। कहानी जब पात्र के माध्यम से व्यापक संदभोर्ं से जुड़ती है तब वह कहानी का अस्तित्व लेती है। राही मासूम रजा की खलीक़ अहमद बूआ और एम०एल०ए० साहब ऐसी ही कहानियाँ है।
खलीक़ अहमद बूआ-लीक से हट कर अनोखी -प्रेमकथा कही जा सकती है। लौकिक से इहलौकिक पे्रम तक की पे्रम गाथाओं से विश्व साहित्य भरा हुआ है। परन्तु यह अपने ढंग की अलग कहानी है। समाज के लिखित अलिखित विधानों के अनुसार एक अप्राकृतिक संबंधों की प्रेमकथा। समाज में निषिद्ध होने पर भी ऐसे संबंध कमोबेश हर समाज और युग में रहे हैं। कहानी में मूल प्रश्न नैतिकता का नहीं बल्कि निष्ठा, विश्वास, समर्पण और संबंधों की नैतिकता का है।
कहानी का मुख्य पात्र खलीक़ अहमद एक हिजड़ा है जो एक नवजवान रुस्तम को कहीं से भगा कर लाए हैं। पति-पत्नी संबंधों में खलीक़ एक समर्पित पतिव्रता की तरह संबंध निर्वाह कर रहे हैं। वह पाँचों वक्त की नमाज पढ़ने के साथ ही अपने सुहाग रुस्तम के लिए चौथ का व्रत भी रहते हैं। उनको दो ही भय हैं। एक मौत का, दूसरा रुस्तम की बेवफाई की आशंका। बच्चों द्वारा चिढ़ाए जाने, खलीक़ अहमद बूआ मर गई पर वह बच्चों को कोसते, गाली देते हैं। परन्तु उन्हीं बच्चों का चुप रहना, उनका न चिढ़ाना भी नहीं भाता। रुस्तम के संबंध एक वेश्या से हो जाते हैं। खलीक़ अहमद निराश हो शहर छोड़ने की तैयारी में है। तभी एक दिन वह रुस्तम को पीछे के दरवाजे से वेश्या पुखराज के कोठे पर जाते देखते हैं। वह कोठे पर जाते हैं, रुस्तम की हत्या कर देते हैं। वह पकड़े जाते हैं और उन्हे फाँसी हो जाती है। थोड़े दिन बाद लोग उन्हें भूल जाते हैं।
कहावत है कि प्रेम और जंग में सब कुछ जायज है। ऐसी स्थिति में पे्रम के चरम अथवा नफ़रत में मनोवैज्ञानिकों के अनुसार दोनों के पीछे एक ही भावना होती है। खलीक़ द्वारा रुस्तम को मार दिया जाना अनहोनी नहीं लगता क्योंकि प्रेम विकल्पों के द्वन्द्व में नहीं उलझता।
लेखक ने पात्र का भरपूर मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया है। चिढ़ाए जाने पर ख़लीक़ बच्चों को कोसते, बिगड़ते दिखाई देते हैं। परन्तु यह उनका ऊपरी दिखावा है। वीरान सड़क पर किसी की आवाज न सुनाई देने पर वही ख़लीक़ बड़बड़ाते नजर आते हैं,आज कौनों हरामजादे की आवाज नहीं आ रही। मर बिला गए सब। सन्नाटा उन्हें डराता है। क्योंकि वह मौत से जितना नहीं डरते, उतना सन्नाटे, तनहाई से डरते हैं। वास्तव में मौत का डर भी तो उसी तनहाई के कारण ही होता है। सच तो यह है कि बेपनाह मोहब्बत करने वाले खलीक़ के बच्चे अजीज हैं। उन पर उनका गुस्सा एक दिखावा है। रुस्तम की बेवफाई से दुःखी खलीक़ से पूरे शहर को हमदर्दी हैं। खलीक़ ने रुस्तम का पुखराज के कोठे पर जाना सुना है। रुस्तम ने उनके पास आना भी छोड़ दिया है। यह शहर छोड़ने की तैयारी भी कर रहे हैं। परन्तु वह उस वक्त रुस्तम को मारते हैं जब वह स्वयं उसे अपनी आँखों से पुखराज के कोठे पर जाते देखते हैं। पे्रम में शायद ऐसा ही होता है। बात बेपर्दा न होने तक मन के किसी कोने में संदेह बना रहता है। दिल बेवफाई का यक़ीन नहीं करता।
भाषा की खूबसूरती, रवानगी, अप्रतिम प्रयोग यथा सड़क जाग जाती है। धूप मुंह फेर हंसने लगती है। नीम और पीपल के पेड़ मुंह फेर मुस्कराने लगते, मुंडेर पर बैठी वुजू करती मस्जिद आँखें उठा देखने लगती। लेखक परिवेश का मानवीकरण कर देता है। बिंबों को जीवंत कर चित्र उपस्थित कर देता है।
कहानी के अंत में लेखक समय की इस कटु लेकिन अनिवार्य सच्चाई की ओर इंगित करना नहीं भूलता, फिर वह भी खलीक़ अहमद बूआ को भूल गए।
मार्मिक से मार्मिक चरित्र के लिए लोगों द्वारा भूला दिया जाना समय की नियति है। एक लेखक ही है कि पूरे अमृत या विष को पीकर विभिन्न रूपों में इन्हें सृजित करता है।
इसी क्रम की एक और महत्त्वपूर्ण कहानी है-एम०एल०ए० साहब। कहानी राजनीतिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य है। मतदाताओं को बेवकूफ़ बनाने का सिलसिला चुनावों का अहम्‌ हिस्सा है।
कहानी का मुख्य पात्र एम०एल०ए० साहब कहीं के विधायक नहीं बल्कि मौलाना लतीफ अहमद है, जिन्हें संक्षेप में एम०एल०ए० साहब कहा जाता है। परन्तु इस बात को कोई नहीं जानता। एम०एल०ए० साहब का काम चुनावों में अपने तरीके से प्रचार और तकरीरें करना है। उनके लिए पार्टी महत्त्वपूर्ण नहीं। उम्मीदवार चाहे किसी पार्टी से हो या आजाद, जो उन्हें पैसा/पारिश्रमिक देगा उसके लिए वह हाजिर हैं। भोले मतदाताओं को समझाने और उनके प्रचार करने के तरीके ऐसे अनोखे हैं कि माहिर राजनीतिक भी मात खा जाते हैं। राजनीति का इतिहास ऐसे चरित्रों से भरा हुआ है। यह लेखक की खूबी है कि इस चरित्र के परिपे्रक्ष्य में वह राजनीतिक विसंगतियों को ही नहीं उजागर करता बल्कि ऐसे चरित्र को उसकी विवशता, अभावों और करुणा के साथ प्रस्तुत करता है।
कहानी के अनुसार राजनीतिकों की ओर से आम आदमी का मोहभंग तभी हो गया था, आज एम०एल०ए० होने में क्या बड़ाई है। हर सातवां, आठवां आदमी या तो एम०एल०ए० है या होना चाहता है। इसमें कोई नयापन नहीं रह गया है। लेखक इस राजनीति का कोयले की दलाली मानता है। इसमें मुंह तो ज+रुर काला होता है, लेकिन मुट्ठी गरम रहती है।
विडम्बना तो यह है कि मुंह जो मनुष्य के सम्मान, नैतिकता और मूल्यों का प्रतीक है उसकी क्या सिफत! महत्त्वपूर्ण तो मुट्ठी है। अर्थात्‌ धन के आगे मनुष्य का सम्मान, इंसानियत, मूल्य सब व्यर्थ हैं। इस हम्माम में सभी नंगे हैं। काले लोगों के देश में मुंह की कालिख किसे दिखाई देगी। शायद लेखक का मंतव्य है कि जब लिप्सा और अनैतिकता को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है तब मानवीय मूल्य अपना अस्तित्व खो देते हैं।
जनसंघ और मुस्लिम लीग के प्रति लेखक की नापसंदगी एम०एल०ए०साहब की तकरीर में प्रकट होती है नफ़रत के इन ताजिरों से हमें या आपको क्या लेना देना।लेखक इन दोनों ही को साम्प्रदायिक मानता है। मतदाताओं को बरगलाने के सिलसिले में, पानी की बिजली निकाल लिए जाने'' जैसे विनोदात्मक प्रसंग इस बात का प्रतीक हैं। प्रसंग बदल जाते हैं। अभावों, वायदों से मुकरने के निदान के लिए नए-नए बहाने बनाए जाते हैं। एम०एल०ए० साहब की प्रधानमंत्री से वाकी टाकी पर बात, फ्लोर क्रास करने की बात, चुनाव के टिकट को अस्वीकार करने की गप्प आज के परिदृष्ट में सिफारिस के लिए झूठे फोन, पार्टी बदलने की गीदड़ भभकियां, हाईकमाण्ड पर रोब की कहानियां का पूर्वाभास है। लेखक भारतीय प्रजातंत्र की विडम्बनाओं को कहानी के माध्यम के प्रकट करता हैं। कैसी विडम्बना है जो चुनाव जीतते है धूस खाना शुरू कर देते है और हारने वाले प्रजातंत्र बचाओ आंदोलन चलाने में। जब तक वह खुद न जीत लें और घूस खाने में लग जाएं। भारत में प्रजातंत्र हारने वाले की कोशिशों से ही बचा हुआ है।
राजनीतिक विसंगतियों, भ्रष्टाचार, विद्रूपताओं को कथा प्रसंगों, मुहावरों और भाषा संदर्भों के प्रयोग से उद्घाटित किया गया है-धूल में रस्सी बटना, रंडियों के मुजरे की तरह चुनाव का बीड़ा लेना, एक ही चुनाव क्षेत्र में दो-दो उम्मीदवारों से पैसा ले लेना आदि।
कहानी का मुख्यपात्र एम०एल०ए० साहब आम आदमी की तरह इस भ्रष्ट राजनीतिक परिदृश्य का हिस्सा बनने के लिए अभिशप्त हैं। वह सभी की असलियत जानता है इसीलिए किसी उम्मीदवार को वोट देने लायक नहीं मानता। कहानी में एक जीवन दर्शन है। आदमी जिससे मिलना चाहता है उसी से नहीं मिल पाता और जिससे नहीं मिलना चाहता उससे बार-बार मिलना पड़ता है। अथवा जन्मदिन शायद इसीलिए महत्त्वपूर्ण होता है कि उसके सहारे मरने के लिए दिन गिनने में आसानी होती है।
लेखक कहानी के माध्यम से राजनीति की पुनःव्याख्या कर उसकी पर्त दर पर्त उधाड़ता है, जिसकी देश-काल-वातावरण के अनुसार आज जरूरत है। राजनीति के साथ-साथ उन चरित्रों के रेश-रेशे को उधाड़ती यह कहानी आम आदमी के मोहभंग की कथा है। आजादी के बाद में राजनीतिक का जिस तरह स्वरूप विकृत हुआ उसकी यह पुनःव्याख्या करती है।
राही मासूम रजा की एक लंबी कहानी, उनकी श्रेष्ठ कहानियों में एक, सिकहर पर दही निकाह भया सही है। यह सत्तर के दशक के प्रारंभ में धर्मयुग में धारावाहिक रूप ही प्रकाशित हुई और चर्चित रही है।
राही का साहित्य समाज का आइना है। इनके पात्र समाज के हर वर्ग से उठाए गए हैं। प्रत्येक पात्र अपनी आकांक्षाओं, सपनों, कुण्ठाओं, अभीप्साओं के साथ अपने समय का प्रतिनिधित्व करता दिखाई देता है। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि यह पात्र अपने-अपने निजी इतिहास से जुड़े रहने को अभिशप्त हैं। भले ही प्रगति अवरुद्ध होती हो, परम्पराओं, सड़ी गली रूढ़ियों से चिपके रहना इनकी नियति है। अतीत से मुक्ति इन्हें असुरक्षा के गहरे अंधेरे में ढ़केल देती है। ऐसे लोगों, स्थितियों और एहसासों की कहानी है-सिकहर पर दही निकाह भया सही।
कहानी की कथावस्तु आजादी के तत्काल बाद की है। एक जमाने में मीर जामिन अली के निराले ठाठबाट थे। जमींदारी बड़ी न होने पर भी सभी सामंती विशेषताएं-संगीतकार, आसामियों की बेदखली, मुश्कें कसवाना, बेगार, गालियां आदि। उन्हें यकीन नहीं था लेकिन जमींदारी चली गई। वह अतीत की परछाईओं के डर से गाँव छोड़ कर शहर में एक छोटा मकान किराए पर लेकर रहने आ गए। साथ थी उनकी पत्नी अमीना, पुत्रियां रुकैय्या और रजिया। पुश्तैनी नौकरानी मत्तों और उसका पुत्र शौकत। उन दिनों के हिसाब से ग्यारह वर्ष की उम्र में ही जवान होती बड़ी बेटी रुकैय्या की शादी की चिंता से उन्हें नींद न आती। ऊंचे खानदान के लड़के बटवारे में पाकिस्तान चले गए हैं। छोटे खानदान में वह बेटी का विवाह करेंगे नहीं। अन्ततः अपने से केवल तीन-चार बरस बड़े शम्सू मियां से रुकैय्या का निकाह हो जाता है। समय काटने के लिए रजिया को स्कूल में पढ़ाया जा रहा है। शौकत को रजिया बचपन से ही अच्छी लगती है। रजिया का बचपना, अकेलापन और चारों ओर होने वाले परिवर्तन उसे बेचैन करते गए। ऊपर कमरे की खिड़कियों से लाउडस्पीकर पर सिनेमा के एलान सुनती, रात में पानी पीने के बहाने उठकर बेखबर सोए शौकत को देखती। अनजाने ही रजिया और शौकत में प्यार हो जाता है। परन्तु बात खुलने और फैलने पर मत्तों की अपने मालिक के प्रति नमक हलाली और मीर जामिन अली की खानदानी हैसियत की वजह से शादी उनके बीच हो नहीं सकती थी। रजिया की शादी बासठ साल के रंडुए लड़के से तय होती है। जो रजिया की फोटो देख कर शौकत और रजिया के संबंध में, चार-चार खतों के पहुंचने पर भी लट्टू है। खतों की लिखावट की तहरीर रजिया के हाथों की हैः परन्तु निकाह के पहले ही एक रात रजिया और शौकत परछाई बन कर कहीं चले जाते है। जिसमें पहल रजिया की तरफ से होती है।
कहानी समय के परिवर्तनों को आत्मसात्‌ करने की द्विविधा, बदलते मूल्यों और मान्यताओं एवं रूढ़िग्रस्त मानसिकता के अन्तर्द्वन्द्व को व्यक्त करती है। दरअस्ल परिवर्तन में ध्वंस व टूटने और निर्माण दोनों की प्रक्रियाएं साथ-साथ काम करती हैं। इसके साथ चलने से जो लोग छूट जाते हैं। वे निरन्तर पीछे पड़ते जाते हैं। इस अनिवार्य और निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया में परम्पराओं और सड़ी गली रूढ़ियों में देश-काल-गत बहुत सूक्ष्म अन्तर होता है। जो व्यक्तिपरक आधार पर तय होतां हैं। पूर्वोग्रहो के कारण समायोजन न करने वाले लोग, पीढ़ियों, संस्थाएं कालातीत होने को विवश हो जाती हैं।
राही समय से सीधा साक्षात्कार करते हैं। आजादी के आस-पास का समाज आन्तरिक और वाह्‌य दोनों तरह से एक जटिल समाज था। इसमें बदलाव के दौर में अकेले छूट गए लोग निर्वासन भोगने को विवश थे।
परन्तु यह कहानी अकेले, निर्वासित, टूटे हुए लोगों की ही नहीं हैं। इसमें नई रोशनी के नायकों की कहानी भी है। वे क्रान्ति नायक जो मुखर और सक्रिय नहीं होते बल्कि परछाई बन कर अपनी असहमति और प्रतिरोध व्यक्त करते है। कहानी का शिल्प, भाषा और प्रस्तुतिकारण उसकी रवानगी, मार्मिकता और खूबसूरती का एहसास हर पल कराता रहता हैं। राही अपनी भाषा से कहानी का दृष्टिकरण उपस्थित करते हैं। राही नए मुहावरे गढ़ते हैं। घर में छह शताब्दियां रहती थी।...गलियां रहती थीं...किसानों की सिसकियां रहती थीं।
दीवारें गर्दन झुका-झुका कर उन्हें देख रही है। और आपस में इशारे कर के मुस्करा रही है।/ बेटी की उम्र बड़ी बेहया और बेदर्द होती है।
वह सुबह को शाम और रात को दिन कैसे बनाए सारे बदन में जैसे हजारों हजार दिल धड़कने लगते और इन हजार दिलों में लाखों लाख चिराग जल जाते और उनकी रग-रग में उजाला हो जाता/ छतनार बूढ़े पेड़ की तरह आंधी में टूट गए/ जैसे भाषिक संदर्भ कहानी की वेधकता कर्ई गुना बढ़ा देते हैं। राही की रचनाओं में प्रतीक आरोपित नहीं होते। बल्कि रचना के अंतर से निकलते हैं।
सदा की भांति राही कहानी में व्यंग्य के प्रसंग आने पर नहीं चूकते।-जामिन अली रख रखाव वाले आदमी थे। जिंदगी भर नमाज पढ़ते रहे, गालियां बकते रहे और गुनगुनाते रहे।/हिन्दू सोशल और मुस्लिम सोशल क्या होता है।/ हीरो यदि नवाब नहीं होता तो कवि अवश्य होता है।
कहानी अपने समय, स्थितियों, मानसिकता, और तत्कालीन विवरणों तक सीमित नहीं रहती बल्कि जीवन, उसकी जटिलताओं, मनुष्य की नियति और बदलती मान्यताओं को दस्तावेज बनने में सफल है।
इन कहानियों के विवेचन से विदित होता है कि राही की कहानियों में उनके अंदर का कवि मुखर होता हैं। न केवल कथ्य के अन्दर बहते भाव, पात्रों की मनः स्थिति के निरूपण में वरन्‌ भाषिक अभिव्यक्ति में भी। यद्यपि लेखक का स्वयं कहना है कि कविता की जबान नकली होती है। इसी में इसका हुस्न हैं। जीवन जटिल होता जा रहा है और कविता के माध्यम से इस जीवन को संपूर्णता से व्यक्त नहीं किया जा सकता। कथा भाषा यदि नकली हो जाए तो कहानी मारी जाती है।''
राही के साहित्य के गहन अध्ययन से मालूम होता है कि राही अपने संपूर्ण संघर्ष,असहमति, स्थितियों पर कटाक्ष, समस्त विरोध और युयुत्स भाव के बावजूद अंदर से स्वप्नदर्शी, कोमल सहज और तमाम प्रतिकूलताओं के बीच मानवीय मूल्यों के प्रति आस्थावान नज+र आते है।
कविता की एक विशिष्टता-मानवीय अस्मिता पर अगाध आस्था-ही उसे साहित्य की अन्य विधाओं से अलग पहचान देती है। यही कारण है कि राही के साहित्य पर, आने अनजाने ही, काव्यगत प्रभाव लक्षित होता है।
कथाकार का सरोकार भाषा से भी होता है। हर कथाकार अपनी कथा भाषा अथवा कहा जाय कि हर रचना अपनी भाषा प्रवृत्ति लेकर आती है। राही भाषा को अपनी जमीन की सोच से जोड़ने का काम करते हैं।
राही बहुत स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भाषा और धर्म का रिश्ता जोड़ना ही ग़लत है। क्योंकि कुछ लोगों में भाषाओं को धर्म से जोड़ कर देखने की प्रवृत्ति है। वह उर्दू को देवनागरी लिपि में लिखने के समर्थक थे। उर्दू साहित्य की भाषा अपने आलेख में वह स्पष्ट करते हैं-मैं भविष्य में इतनी दूर तो देख ही सकता हूँ कि यह कह सकूँ कि उर्दू लिपि थोड़े दिनों की मेहनत है।
वह अपने संबंध में कहते हैं-मैं भी उर्दू वातावरण में पला बढ़ा हूँ। मैं उर्दू में ही ख्+वाब देखता हूँ। परन्तु मैं इस लिपि को भाषा नहीं मानता। मेरी भाषा वही है जो कबीर, सूर, तुलसी, जायसी, यशपाल, ड्डष्णचन्दर की है।
राही मासूम रजा की भाषा पाठको को न केवल बाधे रहती है बल्कि वह अपनी सादगीपूर्ण, सहज, गुदगुदाने वाली व्यंग्यात्मक और शब्दों के पारदर्शी स्वरूप जो जीवन के अनुभवों को कलात्मक ढंग से व्यक्त करते हैं, भाषा से पाठकों के हृदय पर अमिट छाप छोड़ने में सफल होते हैं।
राही मासूम रजा की कहानियां जीवन की तमाम प्रतिकूलताओं के मध्य जीवन के प्रति आस्था को बनाए रखती हैं। यह कहानियां जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ऐसे कोण से प्रकाश डालती है कि वह एक बड़े परिदृश्य का हिस्सा लगती हैं। वह अपनी कहानियों से आज के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे में व्याप्त विकृतियों पर करारी चोट करते हैं। यह उन्हीं की हिम्मत थी कि साम्प्रदायिक शक्तियों, उनके नेताओं को नाम लेकर जिम्मेदारों ठहराते रहे। उनका मानना था इन सभी साम्प्रदायिक शक्तियों का मूल चरित्र और उद्देश्य एक है।
राही न केवल साहित्यकार बल्कि एक चिंतक के रूप में सामने आते हैं। राष्ट्रीय, सामाजिक,सांस्कृतिक,राजनीतिक और मानव व्यवहार के विषय में उनका चिंतन वस्तुपरक, निरपेक्ष और संतुलित और निर्भीक दिखाई देता है। साम्प्रदायिकता पर उनके विचार क्रांतिकारी हैं।