Thursday, December 11, 2008

राही मासूम रजा

-शिवकुमार मिश्र

राही मासूम रजा का जन्म १९२७ ई. में हुआ था। गंगौली-गाजीपुर में जन्में और बम्बई में गत हुए। देखा जाए तो वे सूरज की तरह उगे, उसी की तरह परवान चढ़े और उसी की मानिंद अस्त हुए। सूरज की ही तरह उनकी जीवन-यात्रा पूरब से पश्चिम दिशा की ओर रही। सूरज की ही तरह जलते हुए समूचे साहित्य-संसार को रोशनी और ऊष्मा देते रहे, लोगों के मन के अँधियारे में अपने विचारों की किरणों का प्रकाश फेंकते रहे।
तमाम मस्ती और लापरवाही के बीच भीतर से वे निहायत बेचैन आदमी थे। उनकी इस बेचैनी का सबब उनका अपना जमीर था जो उन्हें चुप नहीं बैठने देता था। लगातार कुछ करने और कहने के लिये उन्हें उकसाया करता था। वे वस्तुतः बड़े संवेदनशील इंसान थे। उनकी चमड़ी बहुत मोटी नहीं थी कि तमाम कुछ उस सबको जज्ब कर ले जो उनके चारों तरफ, पूरे हिन्दुस्तान में देश और समाज में घट रहा था। उसका त्रासद अहसास उन्हें बेचैन करता था और वे कलम उठाकर लिखने लगते थे। हम सबके बीच से उनके असमय में उठ जाने का सबब उनकी यह बेचैनी थी। मैं नहीं जानता कि अपने घर-परिवार के लिए वे क्या कुछ छोड़कर गए परन्तु उनके जिस छोड़े हुए को मैं तथा पूरा साहित्य-संसार जानता है वह है उनकी इंसानी शख्सियत, एक लेखक के रूप में उनका अपना रचना-संसार, वह यश जो उन्होंने कमाया और जो सबको नसीब नहीं होता। इस लेख का शेष भाग राही विशेषांक में पढ़े.... http://rahimasoomraza.blogspot.com/2008/10/blog-post_7125.html इस पर क्लिक करें .और जानकारी प्राप्त करें.

3 comments:

"अर्श" said...

ji itne mahan hasti ke bare me mujh jaisa adana sa shaksa kya kahe ... shokakul hun....

Dr. Chandra Kumar Jain said...

आपका आभार रज़ा साहब
को इस लाज़वाब अंदाज़ में
उनकी ही तरह प्रस्तुत करने के लिए.
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

santosh kumar Jha said...

vibhajan ke dansh ke sath mili azadi ke baad hindi janmanas ko jis sahitya ki sabse zyada zarurat thi wo sahitya rahi ne hame diya. hindu muslim ekta kyu jaruri hai jaise prashn ka sabse behtar jawab oonhone hi hame diya.unka sahitya dilo ko jodta hai.aatma ko vistar deta hai.